Monday, 28 August 2017

SAW - LNMI PATNA


SAW-Self Awakening Workshop at LNMI-Patna



In present era  students and youth society is facing many problems due to competitive circumstances. In this competitive world of today young minds are facing many psychological arrests. After getting professional degrees (MBA, MCA, B-tech) from renowned universities they face competition for Job in Job-Market. But there is lot of difference between educational life and market life.  Sometimes they face failure in competition and sometimes they face humiliations in hierarchy system of Job. Youth are facing many problems like financial problems, work place stress, and relationship stress. And due to this they are facing many type of mental illness like depression, anxiety, insomnia, suicide, eating disorder, addiction and many more psychosomatic diseases. 
                            
Keeping this problem in priority Divya Srijan Samaaj (DSS) designed a program named SAW (Self Awakening Workshop) to make people free from this type of mental-agony. This revolutionary program is based on ASHTAANG-YOG concept of PATANJALI YOG-SUTRANI.
Divya Srijan Samaaj conducted this program at LNMI-PATNA (L N Mishra institute of economic development and social changes) a renowned college of Management in North India. Coordinator of LNMI-Patna Dr S. D. Singh (Professor) organized this program in auditorium of College for MBA & MCA students.


Shri Manish dev (Gen. Secretary) of Divya Srijan Samaaj is a Spiritual Preacher, Mind power trainer, Sub-conscious trainer, motivational/ Spiritual speaker and also a writer for this topic. Shri Dev delivered his lecture and presentation on Thought-process, Sub-conscious mind and Meditation in three days SAW program of LNMI-Patna from 17 to 19 august 2017. This Program proved like a boon for young minds of LNMI-Patna.


Along with this Dr. Paresh sheth director of English dot com (from Mumbai)  delivered his lecture on Communication-skill and  Interview-facing for students.


In the end Dr. Chandra (Senior Professor) of LNMI-PATNA delivered vote of thanks.  
          

Thursday, 10 August 2017

अहिंसावादी श्री कृष्ण


अहिंसावादी श्री कृष्ण
(मनीष देव)





‘हिंसा’ और ‘अहिंसा’ इस विषय को लेकर प्रायः हमारे देश में चर्चा चलती रहती है | ‘हिंसा’ क्या है ! और ‘अहिंसा’ क्या है ! हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग, पत्रकार समुदाय, एवं नेतागण अपना-अपना पक्ष रखने के लिए कभी संविधान तो कभी धर्म का आधार, या फिर बापू महात्मा गांधी, महात्मा बुद्ध एवं तीर्थंकर महावीर के नाम का आधार लेते रहते हैं | पाश्चात्य संतों का नाम भी कुछ लोग ले लेते हैं | लेकिन, जब अहिंसा को उपमा देनी हो तो उन्हें दूर-दूर तक श्री राम और श्री कृष्ण का नाम याद नहीं आएगा | गलती से किसी को ईस विषय पर भाषण-प्रवचन देते हुए याद भी आ जाए तो वह अपनी बुद्धिजीविता की अस्मिता को बचाने के लिए श्री राम एवं श्री कृष्ण के नाम को अपने भाषण-प्रवचन में से वैसे ही निकाल बाहर करता है, जैसे भोजन करते हुए तीखेपन के स्वाद से बचने के लिए स्वादिष्ट सब्जी में से भी व्यक्ति हरी मिर्च को चुन-चुन कर बाहर निकाल देता है, लेकिन फिर भी कभी सब्जी में हरी मिर्च डालने का विरोध नहीं करता | प्रश्न करने पर उत्तर देता है कि हरी मिर्च स्वास्थय-वर्धक एवं आवश्यक है, परन्तु उसके तीखेपन से बचने के लिए उसे बाहर निकालना पड़ता है, नतीजा ! हमेशा कडवेपन से बचने की यह आदत उन्हें वैचारिक अथवा राजनैतिक मधुमेह से ग्रसित कर देती है | जिनका यह चर्चित मधुमेह थोडा कम हो और उनके सामने अहिंसा को परिभाषित करने के लिए मात्र दो विकल्प श्री राम और श्री कृष्ण का ही दिया जाए तो वह श्री राम को चुन कर श्री कृष्ण को निकाल बाहर करेंगे, और बोलेंगे “उसने तो जन्म लेते हीं हिंसा शुरू कर दी थी” |  तो फिर यह लेख इन वैचारिक अथवा राजनैतिक मधुमेह से ग्रसित बुद्धिजीवियों के लिए औषधि के रूप में प्रस्तुत है |

आज हम अहिंसावादी श्री कृष्ण की ही चर्चा करेंगे | वैसे तो योगेश्वर श्री कृष्ण की सम्पूर्ण जीवन-लीला हीं अहिंसा और प्रेम से भरा है | महाग्रंथ ‘महाभारत’ के महानायक श्री कृष्ण अहिंसा के आदर्श हैं, और महाभारत स्वयं अहिंसा का ग्रन्थ है | यह सत्य है कि महाभारत में युद्ध की गाथा है, परन्तु महाभारत का उपदेश अहिंसक है | महाभारत के अनुशाषण-पर्व में लिखा गया है :- 

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः | अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ||२३|| अध्याय 115 दानधर्म पर्व | 

-अर्थात अहिंसा हीं परम धर्म है और अहिंसा ही परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य जिससे धर्म की प्रवृति आगे बढती है | महाभारत के अनुशाषन पर्व के अध्याय 60 में अहिंसा को परिभाषित करते हुए लिखा गया :- 

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः| दमस्त्यागो धृति सत्यं भवत्पवभ्रिताय ते ||18|| 

- अर्थात, सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सौंपना, इन्द्रिय संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना पुण्यदायी ही है | यही अहिंसा की परिभाषा है, और यही योगेश्वर श्री कृष्ण के जीवनलीला-चरित्र में दृष्टिगोचर होता है |

हिंसा और अहिंसा के भी दो क्षेत्र हैं, जहां हम इनका मूल्यांकन करते हैं | प्रथम क्षेत्र है व्यक्तिगत जहां हमें मन, कर्म एवं वाणी से अहिंसक बनना है, अर्थात सर्वप्रथम हमारी भावनाएं अहिंसक होनी चाहिए | दुसरा क्षेत्र है- सामाजिक जहां पर संविधान, न्याय और निति से अहिंसक होना पड़ता है | श्री कृष्ण दोनों ही क्षेत्रों में धर्मधुरंधर थे, अर्थात परम अहिंसक थे | अहिंसक संविधान वही हो सकता है जो हिंसा को बढ़ावा ना दे और साथ हीं हिंसा फैलाने वाले को भी बढ़ावा ना दे | श्री कृष्ण ने किस प्रकार अहिंसा को चरितार्थ किया आइये इसे समझते हैं |

गोकुल का सारा दूध, दही और माखन कर के रूप में मथुरा के राजा कंस के पास चला जाता था | उधर कंस की रानियाँ दूध में नहाती थी और गोकुल के ग्वाल-बाल कुपोषण के शिकार हो रहे थे | तब बाल-कृष्ण ने एक आनंदित कर देने वाला बाल आन्दोलन चलाया और माखन-चोरी लीला प्रारम्भ कर दी, जो बिलकुल अहिंसक थी और ग्वाल बालों को उनका हक दिलाती थी | लेकिन इस लीला का परिणाम यह हुआ कि कंस को गोकुल से मिलने वाले दूध दही में कमी आने लगी और कंस के अत्याचार बढ़ने लगे | कंस अपने कई हिंसक असुर दूतों को गोकुल वासियों पर अत्याचार करने के लिए भेजने लगा | तब गोकुल वासियों की रक्षा हेतु श्री कृष्ण ने कुछ हिंसक नरपशुओं का वध भी किया क्योंकि उनका जीवन हिंसा को ही समर्पित था | फिर श्रीकृष्ण ने हिंसा से बचने के लिए हीं गोकुल छोड़ वृन्दावन में जाने का निर्णय लिया | सारे गोकुल वासी कंस के द्वारा फैलाई गयी हिंसा से बचने के लिए ही गोकुल से वृन्दावन पलायन कर जाते हैं | लेकिन कंस की नजरों से ज्यादा दिन तक नहीं बच पाते | कंस का अत्याचार वहां भी शुरू हो जाता है | तब तक ग्वाल बाल भी बड़े हो जाते हैं | सब श्री कृष्ण के नेतृत्व में खड़े होकर कंस से लोहा लेने का निर्णय लेते हैं, तब श्री कृष्ण अपने मित्रों से यही कहते हैं कि – “युद्ध से कभी कोई लाभ नहीं मिलता कंस का काल ही उसे एक दिन मारेगा” | और स्वयं कंस ही कृष्ण को मलयुद्ध में बुलाता है, और उसी मलयुद्ध में श्री कृष्ण के द्वारा कंस वध होता है, और समाज को अभयदान प्राप्त होता है | कंस वध होते ही कंस के सारे संगी-साथी श्री कृष्ण के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं | ज़रा संघ और कालयवन दोनों मिलकर मथुरा पर आक्रमण कर देते हैं | तब योगेश्वर श्री कृष्ण देखते हैं कि अगर यह युद्ध हुआ तो बहुत भयानक हिंसा होगी, मथुरा की निरीह निरपराध जनता मारी जायेगी |  तब श्री कृष्ण ने देखा कि इस युद्ध का कारण मात्र मैं हूँ, अगर मैं बीच से हट गया तो ये युद्ध टल जाएगा और हिंसा रुक जायेगी | तब श्री कृष्ण ने मात्र अहिंसा के लिए युद्ध भूमि को छोड़ा और “रणछोड़” कहलाये और साथ ही युद्ध भी टल गया | 

 श्री कृष्ण ने द्वारिका में अपना राज्य स्थापित किया | उधर हस्तिना पुर में ध्रितराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन अपने मामा सकुनी के साथ मिलकर अनेक प्रकार के षड्यंत्र कर रहा था पर-स्त्री और पर-धन ही उसके जीवन का लक्ष्य बन गया था | दुर्योधन ने छल-कपट से चौरस के खेल में पांडवों को हरा कर उन से सब कुछ छीन लिया | और उनकी भार्या द्रौपदी को अपनी दासी बना लिया और सारी मर्यादाओं को लांघते हुए हिंसक दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की आज्ञा दे दी | भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर ध्रितराष्ट्र सभी उस सभा में बैठे थे, लेकिन दुर्योधन को रोकने में सब असफल हुए | यह भयंकर और मानवता को कलंकित करने वाली हिंसा हस्तिनापुर के राजसभा में हो रही थी, लेकिन बड़े बड़े धर्म धुरंधर बैठे हुए थे, परन्तु सब अपने व्यक्तिगत धर्म  की रक्षा में लगे हुए थे | और पांडवों ने भी अहिंसक प्रवृति को ही अपनाया हुआ था | इसके बाद मात्र एक द्युत-क्रीडा के हार और जीत के आधार पर पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञात-वास की सजा सुनाई गई, जो कि अन्याय पूर्ण था | अहिंसा का व्रत पालन करने वाले धर्मवीर पांडवों ने इसे स्वीकार कर लिया | वनवास में भी उनके साथ कई अत्याचार किये गए | 13 वर्षों में कई बार दुर्योधन ने पांडवों का वध करने का प्रयास किया, लेकिन पांडव श्री कृष्ण की कृपा से बचते गए | हस्तिनापुर में भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर, और ध्रितराष्ट्र सब ने पांडवों को विश्वास दिलाया था कि 13 वर्ष बाद उनका अधिकार उन्हें प्राप्त हो जाएगा, परन्तु दुर्योधन इसके लिए तैयार नहीं था | पांडव और श्री कृष्ण युद्ध की विभीषिका को अच्छी तरह समझते थे, इसलिए वो शांतिपूर्ण ढंग से ही अपना अधिकार मांग रहे थे | लेकिन दुर्योधन बस एक ही रट लगाए हुए था कि युद्ध करो और अपना अधिकार ले जाओ | 

जब दुर्योधन को समझाते हुए सब हार गए तब श्री कृष्ण ने हीं दुर्योधन को समझाने की जिम्मेदारी ली | तब द्वारिकाधीश श्री कृष्ण एक राजा होते हुए भी दुर्योधन के समक्ष एक शान्ति दूत बन कर गए | और दुर्योधन से कहा “दुर्योधन तुम अगर पांडवों को आधा राज्य नहीं देना चाहते तो उन्हें पांच गाँव हीं दे दो, अगर उसमें भी आपत्ति हो तो पांच गृह ही दे दो, वो उसी में संतोष कर लेंगे |” तब दुर्योधन ने उत्तर देते हुए कहा “पांच गाँव और पांच गृह तो बहुत दूर की बात है, अगर सुई के नोक के बराबर भूमि भी चाहिए तो युद्ध के मैदान में आओ और युद्ध लड़ो ! अगर अपने प्राणों की भी रक्षा करनी है तो युद्ध लड़ो  |” श्री कृष्ण के बहुत समझाने पर भी दुर्योधन नहीं माना उल्टा श्री कृष्ण का ही अपमान करते हुए श्री कृष्ण को ही बंधी बनाने की आज्ञा देदी |  तब श्री कृष्ण ने कहा “ठीक है दुर्योधन ! अब युद्ध के अलावा तुमने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा, अब तो पांडवों को अपनी आत्म रक्षा हेतु भी युद्ध हीं करना पड़ेगा |”

कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि श्री कृष्ण ने ही महाभारत का युद्ध करवाया, अगर श्री कृष्ण चाहते तो युद्ध रोक लेते | परन्तु किसको रोकते ! श्री कृष्ण सिर्फ पांडवों को ही युद्ध करने से रोक सकते थे, अगर पांडव युद्ध नहीं करते तो भी दुर्योधन तो युद्ध करता ही, और पांड्वो की हत्या के लिए आतुर रह्ता | अगर महाभारत का युद्ध नहीं होता तो क्या परिस्थिति बनती इस पर भी विचार करना आवश्यक है | सर्व प्रथम, दुर्योधन तो द्रौपदी का सामूहिक शील-हरण ही करता और फिर पांडवों की हत्या, और फिर पांडव समर्थको की हत्या | और जो व्यक्ति पर-नारी और पर-धन का हरण करने में विश्वास करता है, वह तो हिंसा, अन्याय और अनीति का ही प्रसार करेगा | और क्या ! अहिंसक होने का यही तात्पर्य है कि अत्याचार को सहो और हिंसा करने वाले नरपशुओं को हिंसा करने की पूरी स्वतन्त्रता दे दो | श्री कृष्ण सामाजिक अहिंसा का अर्थ अच्छे से समझते थे, और समाज के प्रति जिम्मेदार थे | वह देख चुके थे कि दुर्योधन को रोका नहीं जा सकता, और अच्छा तो यही होगा कि यह पृथ्वी ऐसे हिंसक लोगो से मुक्त ही हो जाए, तभी धार्मिक एवं अहिंसावादियों का जीवन इस धरती पर सुरक्षित हो पायेगा |


आज हमारे देश में भी ऐसे कुछ बुद्धिजीवी पत्रकार, लेखक  और राजनेता हैं, जो एक वर्ग को अहिंसा का पाठ पढ़ाने में लगे रहते हैं और दुसरे वर्ग के द्वारा किये गए हिंसा पर टिपण्णी विहीन हो जाते हैं | सत्य तो ये है कि सामाजिक अहिंसा, न्याय और निति की रक्षा हेतु व्यर्थ ही अपने स्वार्थ के लिए हिंसा करने वालों को प्रतिबंधित करना ही चाहिए, यही श्री कृष्ण का “अहिंसावाद” है |            

Tuesday, 8 August 2017

Divya Srijan Samaaj


दिव्य सृजन समाज

दिव्य सृजन समाज एक आध्यात्मिक-सामाजिक कल्याणकारी संस्था है,जो कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत रजिस्टर्ड है | दिव्य सृजन समाज पिछले दो वर्षों से आध्यात्मिक जागृति, योग, युवा विकास, नशा मुक्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, कला-संस्कृति, सामाजिक-समरसता एवं नारी सशक्तिकरण जैसे समाज कल्याण के कार्य में कार्यरत है |

दिव्य सृजन समाज का विश्वास है कि बिना आत्म जागृति के समाज में कोई ठोस सुधार नहीं लाया जा सकता अतः सर्वप्रथम लोगों को अपने मन एवं आत्मा से जागृत होना पड़ेगा | भीतर जागृति आएगी तभी बाहर भी परिवर्तन आएगा | Self Awakenig Workshop (SAW) आत्म जागृति कार्यक्रम, एक ऐसा ही कार्यक्रम है जो लोगों को सबसे पहले स्वयं के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है एवं स्वयं के प्रति जागरूक होने की विधि भी बताता है | आज का मनुष्य अनेकों मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त है | ज्यादातर मानसिक व्याधियां ही शारीरिक व्याधियों में परिवर्तित हो जाती हैं अतः सबसे पहले मन एवं मन में चलने वाले विचारो के प्रति जागरूक होना पड़ेगा, जब मनुष्य मन से संतुलित होगा तो बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसे आसानी से मिल जाएगा | और यह सब तभी संभव है जब वह आध्यात्मिक ज्ञान से पोषित हो अपने भीतर ही अपने आत्म-स्वरुप का साक्षात्कार कर ले |

अतः दिव्य सृजन समाज, समाज सेवा के इस कार्य को करने के लिए अलग अलग क्षेत्रों में अनेको कार्यक्रम एवं शिविरों का आयोजन करता रहता है | इन शिविरों में भाग लेने वाले लोग अपने जीवन में मानसिक शान्ति एवं मानसिक संतुलन को प्राप्त होते हैं | अपने जीवन के कई समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होते हैं |  

दिव्य सृजन समाज- 
संपर्क सूत्र :- 9661802459divyasrijansamaj@gmail.com
divyasrijansamaaj.blogspot.com      

Monday, 31 July 2017

धार्मिक राजनीती / religious politics


धार्मिक-राजनीति


लेखक- मनीष देव

“धर्म की राजनीति” - वर्तमान में इन शब्दों का प्रयोग हम अपने देश में प्रायः सुना करते हैं, कभी नेताओं के भाषण में तो कभी लेखकों के लेख में या फिर पत्रकारों की पत्रकारिता अथवा समाचार में | प्रायः लोगो को कहते हुए सुनते हैं कि धर्म की राजनीती नहीं होनी चाहिए अर्थात राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म का प्रयोग नहीं होना चाहिए | यधपि, आज हम चर्चा ‘धर्म की राजनीति’ नहीं अपितु 'धार्मिक-राजनीती' पर करेंगे | धर्म की राजनीति के स्थान पर अगर धार्मिक-राजनिति हो, तो फिर दृश्य परिवर्तित हो जाते हैं | और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि राजा अथवा राजनेता अपनी प्रजा की नज़र में एक आदर्श के रूप में होता है | और अगर वह आदर्श धार्मिक गुणों(धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, धी, विद्या, सत्य आदी धर्म के 10 गुण बताये गए हैं) से अलंकृत ना हो, तो प्रजा और राष्ट्र को पतन के मार्ग पर ले जाएगा | इसको समझने के लिए धर्म और राजनीति के मौलिक अन्तर को समझना होगा | राजनीति जीवों के सामाजिक विकास की बाह्य प्रकृति है | और धर्म मनुष्य की चेतना के विकास की अन्तः-प्रकृति है | राजनीति अन्य जीवों में भी पायी जाती है जैसे बन्दर, भेड़, कुत्ता, आकाश में उड़ने वाले पक्षी ये सब भी अपना मुखिया अथवा नेता चुनते हैं | परन्तु धर्म मनुष्य जाती का ही महत्वपूर्ण स्वभाव है | अगर हम धर्म और राजनीति दोनों को पृथक पृथक समझ जाएँ तो पता चलेगा धर्म की राजनीति संभव ही नहीं है | धर्म के नाम पर धार्मिक विकृतियाँ अथवा धार्मिक मान्यताओं और सम्प्रदाय की राजनीति ही हो सकती है लेकिन धर्म की राजनिति संभव नहीं है | परन्तु, धार्मिक-राजनीती संभव भी है और होनी भी चाहिए | सत्य तो यह है कि राजनीति और धर्म का सम्बन्ध तो लक्ष्मी-नारायण का सम्बन्ध है, जहां पर नारायण धर्म के प्रतीक हैं और लक्ष्मी जी धर्म-पालन करते हुए श्रीनारायण की चरण सेवा में लगी हैं, वह राजनीति के प्रतिक स्वरुप में हैं | दूसरा उदाहरण हम विद्युत के उपकरण का भी ले सकते हैं- जैसे विद्युत उपकरण को क्रियाशील करती है लेकिन उपकरण बिजली को नहीं | यह विद्युत धर्म स्वरुप है | राजनीति का सर्वोत्तम सदुपयोग धर्म-रक्षा एवं धर्म-पालना ही है अतः सर्वप्रथम राजा का धार्मिक गुण संपन्न होना अनिवार्य है, अन्यथा राजा फिर अपने राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म की राजनीति शुरू कर देता है | हमारे प्राचीन इतिहास में ऐसा ही एक प्रसंग मिलता है जो इस विषय को और भी स्पष्ट कर देता है |



शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के जन्म के समय हीं यह भविष्यवाणी हो गई थी कि वह एक विश्व-स्तरीय महान सम्राट या फिर महान साधू बनेंगे | सत्य तो यह है कि महात्मा बुद्ध दोनों हीं बन गए साधू वह अपरोक्ष रूप से थे और सम्राट परोक्ष रूप से | महात्मा बुद्ध का धम्म-प्रचार उनके रहते हीं इतना विस्तारित हुआ कि बिना किसी राजनैतिक लक्ष्य के भी बुद्ध के धम्म ने राजनितिक रूप धारण कर लिया | उत्तर भारत के कई राजा अपने साम्राज्य के साथ बुद्ध के अनुयायी बन गए, अर्थात वह बुद्ध के दिए दिशा निर्देश से ही अपने राज-धर्म का पालन करते थे | मगध, कोसल, काशी, अंग, वैशाली, बंग, कलिंग और कौशाम्बी भी भगवान् बुद्ध के आध्यात्मिक आलोक से आलोकित एवं प्रेरित हो रहे थे | मगध नरेश बिम्बिसार एवं कोसल नरेश प्रसेनजीत तो बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बन गए थे | बुद्ध बिना किसी राजभवन के राज-गद्दी पर बैठे वन विहारों में कुश के आसन पर बैठ कर ही सभी राजाओं एवं उनकी प्रजा को राजधर्म-निर्देश देते थे | उनके अनुयायी राजा उनके निर्देशों का पालन किसी सम्राट की आज्ञा की भाँती ही करते थे बस अन्तर इतना था कि बुद्ध उनके ह्रदय के भी सम्राट थे | बुद्ध के शरण में कई राजा धार्मिक राजनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे | वैदिक मतों के अनुसार भी राजाओं को धर्मोपदेश सुनना अनिवार्य था | समय बिता, और बिम्बिसार के हर्यक वंश के बाद शिशुनाग वंश और फिर नन्द वंश का समय आया नन्द वंश का नौवां राजा धननंद बहुत अत्याचारी और भोग-विलासी था | उसका आचरण धर्म-विरुद्ध एवं मानवता-विरुद्ध था | तब उसका विरोध मगध के आचार्यों ने अहिंसक रूप से किया | परन्तु हिंसा के पुजारी धननंद ने शस्त्र-बल से इस विरोध का दमन कर दिया | उस समय आचार्य चणक के पुत्र चाणक्य जो कि तक्षशीला विद्यापीठ के कुलपति भी हुए उन्होंने अपने भाषण-प्रवचन से राजा के विरुद्ध प्रजा को जागृत करना शुरू किया | उसी समय धननंद ने धर्म की राजनीति शुरू की | धननंद ने देखा कि उसका विरोध ब्राह्मण आचार्यों एवं गुरुकुल में रहने वाले ब्रह्मचारियों के द्वारा हीं किया जा रहा है | तब धननंद ने बौद्ध भिक्षुओं की बड़ी बड़ी सभाएं आयोजन करवाई | और प्रजा के बीच घोषणा करवा दिया कि “अब गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को कोई भिक्षा नहीं देगा ! भिक्षा के अधिकारी मात्र बौद्ध भिक्षुक होंगे ये भिक्षुक उन ब्रह्मचारियों से श्रेष्ट हैं” | कुछ समय तक मगध की जनता मानने लगी कि उनका राजा धार्मिक हो गया है | परन्तु उस समय ब्राह्मण वर्ग और भिक्षुक वर्ग में किसी प्रकार का मतभेद नहीं था और आचार्य चाणक्य तो स्वयं बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बनने में विश्वास करते थे, अंततः बौद्ध भिक्षुओं ने आचार्य चाणक्य का ही साथ दिया और धननंद को हटा चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया गया | तब चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को अपने राज्य में बिना किसी भेद भाव के उचित एवं सम्मानित स्थान प्रदान किया और धार्मिक-राजनीति का ज्वलंत प्रमाण प्रस्तुत किया | उसी प्रकार मौर्य-वंश का अंतिम राजा बृहद्रथ धर्मच्युत एवं विलासी हो गया तब महर्षि पतंजलि ने उसे हटा अपने शिष्य पुष्यमित्र शुंग का राज्याभिषेक एक धार्मिक-राजा के रूप में किया |

अतः आज हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियों में जन-मानस को यह समझना आवश्यक है कि ‘धर्म की राजनीति’ एवं ‘धार्मिक राजनीति’ में बहुत अन्तर है | नहीं तो कोई धन का लोभी धननंद धर्म और जाती के नाम पर हमें विभाजित कर के फिर से हमें ठग सकता है | 

--मनीष देव

Thursday, 20 July 2017

Walking Meditation


WALKING-MEDITATION
चलित - ध्यान

(Manish Dev)




वर्तमान समय में कई लोग इस बात को लेकर संशय ग्रस्त रहते हैं, कि 'चलित ध्यान' अथवा 'नित्य ध्यान' या 'walking Meditation' क्या होता 
है | उनका मानना है कि ध्यान तो बैठ कर ही किया जाता है, फिर चलते फिरते ध्यान कैसे किया जाए | जैन, बौद्ध, योग एवं वेदांत जैसे सभी प्राचीन दर्शनों में चलित-ध्यान अथवा नित्य ध्यान का  वर्णन मिलता है |

एक समय भगवान् बुद्ध अपने भिक्षुक शिष्यों के साथ वन विहारों से गुजर रहे थे | सैकड़ों भिक्षुक, तथागत के पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए चल रहे थे | तभी अचानक! भगवान् बुद्ध रुके और पीछे  मुड़ कर सभी शिष्यों पर अपनी नज़र दौडाते हुए एक शिष्य पर उनकी नजर रुक गई | भगवान् बुद्ध ने उस शिष्य को देखते हुए कहा "राहुल तुम क्या सोच रहे हो ? मैं कुछ समय से अपने  शिष्य समुदाय से कुछ नकारात्मक तरंगों को पकड़ रहा हूँ | मैं देख रहा हूँ कि कोई अपने नकारात्मक विचारों को नियंत्रित करने में असफल हो रहा है |" तब राहुल ने दोनों हाथ जोड़ कर भगवान् बुद्ध से कहा " हाँ भगवन ! मैं काफी समय से नकारात्मक विचारों के वशीभूत हूँ | आपके ईस धम्म-पथ पर चलना मेरे लिए कठिन हो रहा है |"  तब भगवान् बुद्ध ने राहुल से कहा "राहुल ! क्या तुम चलित-ध्यान की अवस्था में नहीं रहते ? अगर तुम चलित ध्यान का अभ्यास करोगे तो निश्चित हीं अपने मन की चंचलता पर नियंत्रण कर पाओगे |"  तब राहुल ने भगवान् बुद्ध से कहा "भगवन मैं प्रति दिन बैठ कर ही ध्यान करता हूँ, 'चलित-साधना' अथवा 'चलित-ध्यान' का मुझे कोई ज्ञान नहीं है |" तब भगवान् बुद्ध ने राहुल से कहा "राहुल तुम अपने बढ़ते हुए हर एक पग के साथ अपनी एक एक स्वांस को जोड़ दो | हर स्वांस के साथ अपना एक पग आगे बढाओ , इन स्वांसो की वृति में अपने मन को लगाए रखो | यह एक वृति अन्य वृतियों को तुम्हारे चित पर हावी नहीं होने देगी | यही 'चलित-साधना' अथवा 'नित्य-ध्यान' है | नित्य ध्यान की अवस्था में रहो! सर्वदा सचेत रहो! तभी तुम्हारा विवेक जागृत रहेगा | और अचेतन-मन की दमनकारी वृतियों से अपनी रक्षा कर पाओगे |" 

   नित्य कर्म परायण रहते हुए, एक निश्चित वृति से जुड़े रहना ही चलित-ध्यान अथवा नित्य-ध्यान की परिभाषा है | योगी निरंतर अपने मन में एक वृति को बनाए रखता है, जिससे कि अन्य वृतियां उसके ऊपर हावी न हो सके | वह चलते फिरते एवं हर कार्य करते हुए भी अपनी साधना करता रहता है | श्वांसो के माध्यम से ध्यान करने वाले योग-साधक, अपना हर कार्य करते हुए अपना ध्यान अपने श्वांसों पर टिकाये रहते हैं | फिर योगी निरंतर बैठ कर भी अपने धारणा एवं ध्यान का अभ्यास करते हैं | चलित साधना का अभ्यास करने से बैठ कर की गई ध्यान-साधना में शीघ्र हीं परिपक्वता आती है | इसका अभ्यास करने से चेतन-मन का विकास होता है | और साधक उच्च कोटि का  मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त करता है |

भगवान् श्री कृष्ण भी पृथा-पुत्र अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं -

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ||8.7||
(श्रीमद्भगवद्गीता)

अर्थात, हे अर्जुन! तुम निरंतर श्वांस-श्वांस में मेरा स्मरण करते हुए युद्ध भी करो | इस प्रकार तुम निरंतर सचेत अवस्था में रहते हुए इस धर्म-युद्ध में भी सफलता प्राप्त करोगे और निरंतर योग-ध्यान करते हुए मेरे परम धाम को भी प्राप्त करोगे | और यही जीवन की सफलता है |

(मनीष देव )

Thursday, 13 July 2017

Sanaatan Dharm

सनातन धर्म- मुख्यभाव बिंदु

(मनीष देव )




‘सनातन’ शब्द का अर्थ है, जो अपरिवर्तनशील है, अविनाशी है | सृष्टि के पहले भी वह था, और प्रलय के बाद भी वह रहेगा | उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं आता, वही अविनाशी तत्व है |  वह सम्पूर्ण संसार का एक मात्र नियंता है | उसकी धारणा ही धर्म है | ‘धर्म’ शब्द का शास्त्र-सम्मत अभिप्राय धारण करने से है, और योग शास्त्र के अनुसार ‘धारणा’ की परिभाषा है- “ किसी वस्तु विशेष को लक्ष्य बना लेना ही उस वस्तु विशेष की धारणा है” | अतः वह सनातन तत्व जो सम्पूर्ण जगत का नियंता है, उसको अपने जीवन का लक्ष्य एवं केंद्र बना लेना ही सनातन धर्म एवं सनातन धर्मियों का जीवन-आदर्श है | आइये हम सनातन धर्म के कुछ मुख्य भाव बिन्दुओं पर दृष्टि डालते हैं :---

1.    उपनिषदों में प्रथम उपनिषद ईशावास्य उपनिषद के प्रथम श्लोक में लिखा गया है :-

ईशा वास्यमिदम सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत |
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद धनम् ||


अर्थात, अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत देखने-सुनने में आता है, सब का सब सर्वाधार, सर्वव्यापि, अविनाशी सर्वनियन्ता, सनातन ईश्वर से व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्ही से परिपूर्ण है | इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है | यह समझ कर उन ईश्वर को निरंतर अपने चिंतन में रखना एवं इस जगत को परिवर्तनशील, नश्वर समझकर इसके प्रति अनासक्त एवं त्याग का भाव रखते हुए मात्र कर्तव्य पालना एवं कर्म परायण प्रकृति के साथ कर्म का सामंजस्य बनाने हेतु अनासक्त भाव से कर्म करते रहना अथवा जगत-विषयों का उपभोग करना और मन को उसमें नहीं फंसने देना | ईशावास्य उपनिषद का यह प्रथम महावाक्य हीं सनातन धर्म, संस्कृति एवं जीवन का आदर्श है |

2)    वह सनातन ईश्वर सर्वव्यापी है; हर रूप में उसका रूप विधमान है | कठोपनिषद -2/12 में लिखा गया :-


एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति |
तमात्मस्थं ये अनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम ||


उस एक सनातन ईश्वर के वश में सारे जीव हैं | वह ईश्वर एक रूप से अनेक रूप धारण कर लेता है | अलग अलग देवी देवताओं के रूप में वह एक ईश्वर ही स्वयं को प्रकाशित करता है | इस प्रकृति के विभिन्न रूपों में वह एक ईश्वर ही प्रकाशित होता है | वृक्षों के फैली हुई शाखाओं में, नदियों की कल कल करती जल धारा में, गगनचुम्बी पर्वतों की चोटियों में उस ईश्वर का रूप ही विधमान है | प्रकृति का वह हर रूप जो जीवन दायिनी एवं हमें चेतना शक्ति प्रदान करता है वह सब सनातन धर्मियों के लिए पूजनीय ही है | लेकिन, सर्वप्रथम वह परम चैतन्यमयी सनातन ईश्वर मनुष्य के ह्रदय गुहा में ही विराजमान है, और ग्यानी-जन उसे अपने भीतर ही देखते हैं और उसका ध्यान करते हैं | निरंतर उसका ध्यान करते हुए ही वह उस परम शाश्वत सुख एवं शान्ति को प्राप्त करते हैं | यही सनातन धर्मियों के उपासना एवं साधना मार्ग का लक्ष्य है | योगेश्वर श्री कृष्ण ने भी श्रीमद्भग्वदगीता के माध्यम से यही समझाने का प्रयास किया है, कि वह एक ईश्वर ह्रदय गुहा में बसता है | तैतिरियो उपनिषद का भी यही मत है:-

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म | यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् | सो अश्नुते सर्वान कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेती |


वह ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप एवं अनंत है; वही ब्रह्म प्राणियों के ह्रदय रूप गुफा में छिपे हुए हैं | जो उन्हें अपने भीतर ही जान लेता है वह उन विज्ञानस्वरुप ब्रह्म के साथ ही संसार के सभी भोगो का अनुभव करता है | महाभारत में यक्ष के प्रश्न पर धर्मराज युधिष्ठिर का भी यही उत्तर था :-

धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम, महायनो येन गतः सा पन्था |

 अतः धर्मतत्व स्वरुप वह ईश्वर एक ही है और मनुष्य के ह्रदय-गुहा में विराजमान है | वह सनातन ईश्वर हीं एक से अनेक रूप धारण करता है | उस एक सत्य को ही विद्वान लोग अलग अलग तरीके से व्याख्या 
करते है |

‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति |’


3)     सनातन धर्म का तीसरा मुख्य भाव बिंदु है, कि यह जीव उस सनातन अविनाशी ईश्वर का ही अंश है | जैसे वह सनातन ईश्वर अविनाशी है वैसे हीं यह जीव भी अविनाशी है | मध्यकालीन संत गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी ईसी मत की पुष्टि करते हुए श्रीरामचरितमानस लिखते हैं :-

‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशी |’

अर्थात यह जीव सनातन ईश्वर का ही अंश है, यह चेतन मल-रहित, सहज एवं ईश्वर की तरह ही सुख की राशी है | 

भगवान् श्री कृष्ण भी श्रीमद्भगवदगीता में अर्जुन को समझाते हुए कहते
 हैं :-

न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोSयं पुराणों- न हन्यते हन्यमाने शरीरे || 2/20||




यह जीवात्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और ना मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता | अतः जीव अविनाशी है इसकी मृत्यु नहीं होती, यह मोक्ष को प्राप्त होता 
है | जिस प्रकार हम मनुष्य फटे-पुराने वस्त्रों का त्याग कर के नूतन वस्त्र धारण करते हैं उसी प्रकार यह जीव अपने कर्म एवं भावो के आधार पर अनुपयोगी हो गए शरीर का त्याग कर के नए शरीर को धारण करता है | यह जीव अपने कर्म एवं गुणों से प्रभावित होकर एक से अनेक योनियों में भटकता है | यहीं से पुनर्जन्म का सिद्धांत भी आता है | इस अविनाशी जीव का एक शरीर त्याग कर दूसरा शरीर धारण करना ही पुनर्जन्म है | लेकिन यह जन्म शरीर का होता है और मृत्यु भी शरीर की ही होती है | अतः यह जीव अविनाशी ही है, यह जीव ही सुख दुःख का अनुभव कर्ता है | यह जीव ही सभी कर्मों को करने वाला है, और फिर अलग अलग शरीर धारण करते हुए अपने ही कर्मों के फल को भोगता है, एवं सुख दुःख का अनुभव करता है | अतः प्रत्येक सनातन धर्मी जीव के अविनाशी होने का तथ्य स्वीकार करता है, और पुनर्जन्म में भी विश्वास करता है, और अपना परलोक सुधारने एवं मोक्ष की प्राप्ति हेतु अपने कर्म, उपासना, साधना एवं भक्ति के माध्यम से प्रयत्नरत रहता है |

प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी का मोक्ष प्राप्त करना ही जीवन लक्ष्य  है | मोक्ष का तात्पर्य संसार के सभी नश्वर वस्तुओं से आसक्ति का त्याग करते हुए सभी गुण, कर्म, एवं भावों का त्याग करके सनातन ईश्वर-स्वरुप को प्राप्त होना है | यह मोक्ष- निर्वाण, कैवल्य ज्ञान, एवं समाधि के नाम से भी परिभाषित किया जाता है |


अतः सार रूप में हम समझना चाहें, तो सनातन धर्मी एकेश्वर-वाद में विश्वास करता है, साथ ही ईश्वर को सर्वव्यापि एवं सर्वनियन्ता के रूप में स्वीकार करता है | दूसरा वह ईश्वर के एक रूप से अनेक रूप धारण करने में भी विश्वास करता है लेकिन उसमें भी ईश्वर के सगुन एवं निर्गुण रूप की व्याख्या मिलती है | तीसरा यह जीवात्मा ईश्वर का ही सनातन अंश है एवं अविनाशी भी है, यह जीवात्मा मृत्यु नहीं मोक्ष को प्राप्त होता है | मृत्यु और जन्म तो मात्र शरीर के साथ ही संभव है, अपने कर्म एवं भावों के आधार पर जीवात्मा नूतन शरीर धारण करता है | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अपने पुनर्जन्म अथवा परलोक संवारने हेतु कर्म-रत रहे और मोक्ष प्राप्ति हेतु योग-साधना एवं भक्ति का सहारा लेते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करे |   

       ---- श्री मनीष देव 

Monday, 10 July 2017

Sanyam


Sanyam 
संयम :-

धारणा से समाधि की प्राप्ति तक की अवस्था अथवा अभ्यास को संयम भी कहा जाता  है । महर्षि पतंजलि कहते हैं :-
त्रयमेकत्र संयमः ।3/4
अर्थात धारणा से समाधि तक की अवस्था एक रूप में 'संयम' कहलाती है।
अर्थात सर्व प्रथम किसी तत्व की धारणा होती है फिर उसका ध्यान फिर उस तत्व के प्रति एकीभाव होकर योगी उस तत्व की सिद्धि प्राप्त करता है । लेकिन जब योगी अपनी अस्मिता को खत्म कर के तत्व लीन हो जाता है तब वह समाधि की अवस्था में चला जाता है ।
अर्थात समाधि की अवस्था में किसी सिद्धि का अस्तित्व नहीं रहता है । महर्षि पतंजलि के अनुसार  समाधि सिद्धियों के परे की अवस्था है।

जब मन वस्तु के बाहरी भाग को छोड़ कर उसके आभ्यांतरिक भावों के साथ अपने को एकरूप करने की उपयुक्त अवस्था में पहुंच जाता है , जब दीर्घ साधना के द्वारा मन उसी की धारणा करके क्षण भर में उस अवस्था में पहुंच जाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है , तब उसे संयम कहते हैं । इस अवस्था को प्राप्त कर के योगी अगर भूत और भविष्य जानने की कोशिश करे तो उसे संस्कार के परिणामो में केवल संयम का प्रयोग करना होगा ।
पतंजलि योगसूत्र 3/17 ->
शब्द अर्थ और प्रत्यय, इनकी आपस में अध्यास हो जाने के कारण जो संस्कारवस्था आती है उसमें संयम करने से समस्त प्राणियों की वाणी का ज्ञान हो जाता है । अर्थात योगी को भाषा एवं वाणी सिद्धि प्राप्त होती है उसे सम्पूर्ण भाषाओं का ज्ञान एवं पशु पक्षियों की बोलियां भी समझ में आने लग जाती हैं योगी उन सभी बोलियों को बोल भी सकता है ।
पतंजलि योगसूत्र 3/21->
शरीर के रूप में संयम कर लेने से जब उस रूप को अनुभव करने की शक्ति रोक ली जाती है, तब आंख की प्रकाश शक्ति के साथ उसका संयोग न रहने के कारण योगी अंतर्धान होने की शक्ति प्राप्त कर लेता है । वह सब के बीच रहते हुए भी किसी को नज़र नही आता ।
पतंजलि योग सूत्र 3/23 :-
शीघ्र फल देने वाले और देर से फल देने वाले ऐसे दो प्रकार के कर्म होते हैं । इनमे संयम करने से , अथवा अरिष्ट नामक मृत्युलक्षणो से भी, योगी गण देह त्याग का ठीक समय जान लेते हैं ।
पतंजलि  योग  सूत्र 3/27 :-
महाज्योति में संयम कर लेने से सुक्ष्म, व्यवधान युक्त और दूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है ।
सूर्य में संयम कर लेने से सम्पूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त हो जाता है
चंद्र में संयम कर लेने से सम्पूर्ण नक्षत्र ज्ञान अथवा ज्योतिष ज्ञान हो जाता है ।
नाभि चक्र में संयम करने से शरीर के सम्पूर्ण बनावट का ज्ञान हो जाता है।
कंठ कूप में संयम कर लेने से योगी को कभी भूख प्यास नहीं लगती ।
सिर की ज्योति में संयम करने से सिद्ध पुरुषों के दर्शन एवं इक्षामात्र से वार्तालाप भी होता है ।
पंच तत्वों का संयम से पंचतत्वों पर नियंत्रण प्राप्त होता है । प्राणों पर संयम से योगी प्राण लेने और प्राण देने की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।
पतंजलि  योग सूत्र 3/39 :-
बन्धकारणशैथिलयात प्रचारसंवेदनाच्छ् चित्तस्य पर शरीरा वेशः
जब सूक्ष्म शरीर के बंधन का कारण शिथिल हो जाता है और योगी चित के प्रचार स्थानों को जान लेता है । तब वह दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं । योगी एक देह में रह कर और उस देह में क्रिया शील रहते हुए भी अन्य किसी मृत देह में प्रवेश कर के उसे गतिशील कर सकते हैं । ईसी प्रकार वह किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर के उसके मन बुद्धि एवं इन्द्रियों को निरुद्ध कर के उस पर नियंत्रण कर सकते हैं । वह योगी बहु शरीरी भी हो सकता है ।
योगी जल की सतह पर चलने, वायु में उड़ने अग्नि में तैरने की शक्ति प्राप्त कर लेते है ।
पतंजलि योग सूत्र 3/43 :-
शरीर और आकाश के संबंध में चित्तसंयम करने से योगी आकाश (space) अथवा अंतरिक्ष में गमन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है । योगी के लिए स्थूल शरीर की सारी बाधाएं नष्ट हो जाती हैं ।
लेकिन यह अवस्था समाधि नहीं है । समाधि की अवस्था में सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व नहीं रहता वहां कारण शरीर अथवा बीज शरीर भी नहीं टिकता । वहाँ सम्पूर्ण लय होता है ।
समाधि तक पहुंचने के लिए योगी को सिद्धियों का त्याग करना पड़ता है ।

पतंजलि योग सूत्र 3/51
तद्विरागदपि दोषत्रओजक्ष्ये कैवलयं ।। 3/51:-
इन सब सिद्धियों को त्याग देने से दोष का बीज नष्ट हो जाता है , और उसे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है ।
महर्षि पतंजलि योग सूत्र में सिद्धियों के प्रयोग की भर्त्सना करते हुए लिखते हैं ।
स्थानयुपनिमंत्रेणन संगस्यमयकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात ।। 3/52
अर्थात सिद्धियों में आसक्ति एवं आनंद की अनुभूति करना योगी के लिए उचित नहीं है यह उसके लिए अनिष्ट कारी है । यह उसका पतन है । सिद्धियों का प्रदर्शन जनमानस के समक्ष एवं अन्य साधकों के समक्ष करना पाप है । क्योंकि यह अन्य साधको को उनके परमलक्ष्य से भटका कर सिद्धियों की ओर आकर्षित करेगा । अतः यह अनुचित है । महर्षि पतंजलि का यही मत है ।
अगर कोई योगी परकाया प्रवेश की सिद्धी का प्रदर्शन करता है तो वह समाधि की अवस्था को प्राप्त कर लिया ! ऐसा नही समझना चाहिए । यह मात्र संयम और सिद्धि का प्रयोग है । इस अवस्था में योगी का सूक्ष्म एवं कारण शरीर दोनो ही अस्तीत्व में होता है ।
-- श्री मनीष देव जी  (दिव्य सृजन समाज)

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna-

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna- https://youtu.be/lGb7E-LBo14