Friday, 22 September 2017

नव दुर्गा- तत्व चर्चा


प्रथम शैलपुत्री -




शैल का अर्थ है उच्चत्तम शिखर| चेतना ही जीव के अस्तित्व का कारण है | यह संसार जड़ और चैतन्य से बना है | पर्वत वैसे तो जड़ तत्व है | देवी पर्वत पुत्री के नाम से जानी जाती हैं अतः उन्हें शैल पुत्री भी कहते हैं | लेकिन जीव जगत का शिखर उसमें निहित चेतना है जो जीव अस्तित्व का कारण है | परन्तु इसके अन्दर निहित चेतना  की ऊर्जा अपने शिखर पर होती है, केवल तभी आप शुद्ध चेतना या देवी रूप को देख, पहचान और समझ सकते हैं| उससे पहले, आप नहीं समझ सकते, क्योंकि इसकी उत्त्पति शिखर से ही होती है – 
जब ऊर्जा अपने शिखर सहस्रार पर पहुंच जाएगी तो मानवीय चेतना को सर्व्यापी कर देगी । सारे बंधन नष्ट हो जाएंगे । साधक निर्विचार निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त करेगा । चैतन्य शक्ति को उर्ध्वगामी करना ही योग साधना का लक्ष्य होता है । यह शक्ति चेतना के रूप में हमारे अंदर कार्य करती है । मन बुद्धि चित्त अहंकार और यह स्थूल शरीर सब चेतना की शक्ति से ही क्रियाशील रहती हैं, लेकिन बन्धनयुक्त होकर । परंतु जब ऊर्जा उर्ध्वगामी हो तो यह सारे बंधनो को नष्ट कर साधक को परम ज्ञान एवं परमानंद का अनुभूति करवाती है । अतः देवी शैलपुत्री चेतना के विकसित शिखर की स्वरुप हैं | देवी स्वयम चेतना-रूप में हर जीव के भीतर विधमान हैं |



द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी
माँ ब्रह्मचारिणी -


ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ जिस देवी का आचरण ब्रह्ममय हो। ब्रह्मचारी होने का भी यही तात्पर्य है । सामान्यतः लोग ब्रह्मचारी होना अर्थात अविवाहित होना समझते हैं । अतः यहां ब्रह्म के आचरण एवं ब्रह्म की स्थिति को समझना आवश्यक है । ब्रह्म वो है जो सर्व व्यापी तत्व है । ब्रह्म भावातीत है - अर्थात भावनाओं और विचारों के परे है । त्रिगुणातीत है - अर्थात तीन गुण- सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के वशीभूत नहीं होता । ब्रह्म में किसी भाव का प्रवाह नहीं है, वह भावातीत है।
ना सुख-दुःख, न द्वेष-प्रेम, ना लाभ-हानि, ना जय-पराजय, । ब्रह्म-आचरण करने वाला इन द्वैत भावों को धारण नहीं करता अर्थात किसी भाव के वशीभूत नहीं होता है । वह भावनाओं एवं विचारों से ऊपर उठ कर मात्र परमात्मा में ही उसका मन रमन करता है । ब्रह्मचारी का मन अनेक भावों एवं विचारो में रूपांतरित नहीं होता । ब्रह्मचारी निजस्वरूप में ही स्थित होकर आनंदित होता रहता है ।
जब योगी मन की ऐसी अवस्था को प्राप्त करे तभी वह ब्रह्मचारी है। सन्यासी है ।


तृतीय माँ चंद्रघंटा


माँ चंद्रघंटा -
चंद्र मन का प्रतीक है । और घंटा नाद का ।
वैसे तो हमारे मन का घंटा तो मंदिर के घंटे की तरह बजता रहता है । कभी कोई बजा कर चला जाता है तो कभी कोई । हम अपने जीवन में आने वाले परिस्थितियों एवम विचारों से प्रभावित होते रहते हैं । हमारा मन अनेको रूप धारण करता रहता है । मान लीजिए हमारा किसी से छोटा सा झगड़ा हो गया तू-तू मैं-मैं हो गया । झगड़ा तो 5 मिनट के लिए हुआ लेकिन मन के भीतर यह झगड़ा कई घंटों तक चलता रहेगा । और मन अशांत रहेगा । बाहर का झगड़ा बस 5 मिनट के लिए लेकिन भीतर का झगड़ा कई घंटों तक चलता है । हम अपने मन में ही झगड़ते रहते हैं ।
अतः मन की इस खिटपिट से आज़ादी मिले तो जीवन आनंदित हो पायेगा । नहीं तो अनेकानेक विचारो एवं भावनाओं के वशीभूत मनुष्य का मन अनेको रूप धारण करता रहता है । अतः विचारों पर नियंत्रण एवं विचारातीत अवस्था को प्राप्त करना ही आध्यात्म एवं योग का लक्ष्य है । महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में लिखा है -
योगश्चित्तवृति निरोधः ।।
अर्थात चित्त वृति का निरोध ही योग का लक्ष्य है। अतः मनुष्य को धारणा - ध्यान का अभ्यास करना चाहिए ।
ध्यान की विधियों एवम अवस्थाओं में एक 'नाद-ध्यान' की अवस्था है । इस ध्यान में साधक अंतर्निहित दिव्य नाद-संगीत को सुनता है । इस नाद ध्यान में मन की स्थिति हो जाने से मन बहुत तीव्रता से निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने लग जाता है । मन बहुत जल्दी शांत होने लग जाता है । लेकिन यह नाद बिना किसी विधि सहारे के सुनाई देने लगे तभी कल्याणकारी है । और योगी अति शीघ्रता से निर्विचार एवं परमानंद की अनुभूति करवाता है ।
शिवमहापुराण कथनानुसार दो घड़ी तक पूरी एकाग्रता से इस नाद का ध्यान करने वाले योगियों में शिव की शक्ति आ जाती है ।
अतः देवी माँ चन्द्रघंटा का यह दिव्य रूप एवम नाम उस नाद ब्रह्म की अनुभूति एवं परमानंद एवं शिवशक्ति का ही प्रतीक है ।




चतुर्थ माता कुष्मांडा




माता कुष्मांडा -
'कु ' का अर्थ है छोटा अथवा सूक्ष्म, 'ईश ' का अर्थ है सर्वव्यापी चैतन्य शक्ति और अंड का अर्थ है यह ब्रह्मांडीय सृष्टि/ ब्रह्मांड ।
ईश्वरीय शक्ति सर्वव्यापी है । जीवो में चेतना ही ईश्वरीय शक्ति की अभिव्यक्ति । मन बुद्धि चित्त अहंकार, पाँच ज्ञाननेंद्रिया एवं 5 कर्मिन्द्रियाँ ये सब चेतना की शक्ति से क्रियाशील होते हैं । चेतना बहुत ही सूक्ष्म रूप में हैं । लेकिन शक्ति स्वरूप है ।
जड़-चेतना से मिलकर ही सृष्टि बनी है । और देवी कुष्मांडा का यह रूप सृजनात्मक ही है । ब्रह्मांडीय सृजन का प्रतीक है । देवी सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में सृजन हेतु धारण करती है । और यह सृजन की क्रिया नित्य चलती रहती है । चेतना की शक्ति से ही सारे सृजन कार्य संभव होते हैं ।
अतः योग-साधना का लक्ष्य चेतना की शक्ति को विकसित करना ही है । विकसित चेतना सृष्टि करती है । अतः सिद्ध योगियों में सृष्टि करने और इंद्रियों से परे कर्म करने की क्षमता होती है ।
अतः माता कुष्मांडा ब्रह्मांडीय सृजन की देवी हैं। सम्पूर्ण ब्राह्मांड उनके चैतन्य-गर्भ में सृजन हो रहा है ।



पंचम देवी स्कंदमाता



माँ स्कन्द माता
पंचम देवी स्कंद माता के नाम से जानी जाती हैं ।
स्कन्द का अर्थ होता है 'क्षरण' अथवा 'विनाश' ।
एक ओर जहां माता कुष्मांडा सृजन की देवी तो दूसरी ओर देवी स्कन्द माता क्षरण अथवा विनाश की देवी है ।
योगी की चेतना जब उर्ध्वगामी होती है तो एक ओर जहाँ सृजन शक्ति का विकास होता है तो वहीं दूसरी ओर जड़त्व अथवा तामसी शक्तियों का (inertiative power) का विनाश भी शुरू हो जाता । साधक की तामसी वृतियाँ कमजोर पड़ने लगती हैं । उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगता है ।
यह क्रिया बाह्य प्रकृति एवं अन्तः प्रकृति दोनो में चलती है । प्रकृति जब असंतुलित होती है तो क्षरण करती है । अर्थात प्रलय लाती है । अतः माँ स्कंदमाता ईसी क्षरण, प्रलय, अथवा विनाश की सूत्रधार हैं ।
और इसी तामसिकता एवं जड़त्व के विनाश हेतु भगवान कार्तिकेय का जन्म होता है। जो कि एक विकसित चेतना के प्रतीक है। जो सदैव बाल रूप धारण करने वाले ब्रह्मचारी हैं । विकसित चेतना वाले योगियों का स्वभाव भी बालक जैसा ही होता है । और ब्रह्मचर्य भी उनका स्वभाव ही होता है ना कि कोई व्रत । ब्रह्मचर्य तभी सफल है जब स्वभाव-प्रकृति में आ जाये ।
अतः भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर जो कभी मरना नहीं चाहता था उसका वध कर के तामसिकता/जड़त्व का विनाश किया ।
जब भगवान स्कन्द(कार्तिकेय) कैलाश छोड़ कर दक्षिण भारत में शैल पर्वत पर योगसमाधि में लीन हो चले गए तब माता पार्वती मोह वश हठपूर्वक शिव जी के साथ पुत्र से मिलने वहाँ गई थी । तब भगवान स्कन्द ने देवी को ब्रह्म-तत्व का उपदेश कर मोह भंग किया था। वह स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है ।
अतः स्पश्ट हो जाता है कि देवी का यह रूप जड़ता एवं तामसिकता के विनाश का अभिप्राय है । और विकसित चेतना के रूप में भगवान स्कन्द ही विराजमान हैं ।

माँ कात्यायनी

षष्ठम माँ कात्यायनी:-
स्कन्द महापुराण के वर्णन अनुसार परमेश्वर के क्रोध से देवी कात्यायनी का प्राकट्य हुआ | देवी कात्यायनी ने ही सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध किया | कात्यायनी अच्छाई और धर्म का क्रोध है जो सब कुछ सहते हुए अंततः प्रगट होता है | पांडव आजीवन अत्याचार सहते रहे परन्तु अंततः युद्ध को न रोक पाएं |
कात्यायनी चेतना का वह तीव्र वेग है जो योगी साधक की सम्पूर्ण सांसारिक वृतियों का नाश अति शीघ्रता से करती | कात्यायनी दमनकारी है, और सांसारिक तामसिक वृतियों का अतिक्रमण करती है | पानानी के भाष्य को लिखते समय महर्षि पतंजलि ने कात्यायनी के माहात्म्य का वर्णन किया है |

एक समय स्वामी विवेकानंद जी ध्यान में बैठे हुए थे | उनका मन तीव्र ध्यान की अवस्था में नाद-ध्यान में लीन था तभी उन्हें लगा की उनके गर्दन के निचे का शरीर निष्प्राण हो गया है और उनकी चेतना बड़ी तीव्रता से उर्ध्वगामी हो सहस्रार की और अग्रसर है | लेकिन उनके मस्तिष्क में असहनीय पीड़ा भी हो रही है | वो उस चेतना के वेग को रोकने में स्वयम को असमर्थ महसूस कर रहे हैं | लेकिन धीरे धीरे पीड़ा शांत होती गई और आनंद में परिवर्तित होने लगी | बस यही कात्यायनी का तात्विक रूप है | कात्यायनी एक आवेश है अनियंत्रित शक्ति है लेकिन संहार सिर्फ बुराई का ही करती है | कात्यायनी चेतना का वह प्रवाह है जो योगी को सम्पूर्ण बंधन से मुक्त कर उसे पारलौकिक जगत में प्रवेश दे देती है |

माँ कात्यायनी का नाम कात्यायन ऋषि के नाम पर है | इस सन्दर्भ में दो तथ्य हैं |एक यह कि देवी ने ऋषि कात्यायन के पुत्री के रूप में जन्म लिया और दूसरी बात यह की जब त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश ने जब अपनी शक्तियों को मिला कर देवी को प्रगट किया तब वह कात्यायनी के रूप में ही प्रगट हुई और सबसे पहले ऋषि कात्यायन ने ही देवी का स्तवन पूजन किया |

ऋषि कत के पुत्र थे कात्य कात्य के वंश में जन्म लेनेवाले ऋषि कात्ययंन कहलाये | "कत" का अर्थ है "निर्मल" और कात्य अर्थात निर्मल करने वाला | और कात्यायनी सब को निर्मल करने वाली चैतन्य शक्ति माँ है |



सप्तम माँ कालरात्रि



माँ कालरात्री -
काल और रात्री को मिला कर बना है कालरात्री | काल अर्थात परिवर्तन का नियम, परिवर्तन ही काल के अस्तित्व का कारण है | और रात्री अर्थात ठहराव, रात्री के समय परिवर्तन धीमी गति से होता है | भावार्थ को समझे तो रात्री में हर कार्य रुक जाता है | अर्थात काल रात्री अर्थात परिवर्तन से अपरिवर्तन की और ले जाने वाली शक्ति | नश्वरता से इश्वर्ता की और ले जाने वाली शक्ति | जड़ से चेतन की और ले जाने वाली शक्ति |
मृत्यु से अमरत्व की और ले जाने वाली महाशक्ति ही देवी कालरात्रि है | 

यह प्रकृति नित्य परिवर्तनशील है | लेकिन ईश्वर शाश्वत एवं सनातन है | काल प्रकृति का गुण है ईश्वर कालरहित है | जब योगी-साधक की चेतना इन्द्रियों के बंधन को तोड़ने लगती है तब वह इन्द्रियातीत अनुभूतियों को भी प्राप्त करता है | चेतना उर्ध्वगामी हो एकाग्र होने लगती है | तब सांसारिक परिवर्तन योगी को व्यथित नहीं करते | विचारों का खेल और मन की खिट-पिट ही ख़त्म सी हो जाती है | योगी मस्तिष्क की और प्रावाहित होने वाले चेतना के प्रवाह में परमानंद की अनुभूति करता है | इस आनंद के सामने संसार के सारे सुख फीके पड़ जाते हैं - यह अनुभूति का विषय है | 

चैतन्य स्वरूपा माँ कालरात्रि अहंकार रूपी महिषासुर एवं अनियंत्रित विचार रूपी रक्तबीज के लिए महाप्रलय के सामान है | रक्तबीज का रक्त जहां गिरता था वहीँ दुसरा रक्तबीज प्रगट हो जाता था | यही स्थिति हमारे मन में चलने वाले अनियंत्रित विचारों के भी होते हैं | एक विचार से अनेक विचार प्रगट होते हैं | और हम सोंचते सोंचते पता नहीं क्या से क्या सोंच जाते हैं | फिर यही विचार हमारा जीवन बन जाता है | अतः मन के इस रक्तबीज को ख़त्म किये बिना जीवन में शान्ति की अनुभूति नहीं हो सकती | योगी विचारों के प्रवाह पर नियंत्रण स्थापित करके तुरिया अवस्था को प्राप्त कर लेता है | योगी को सम्पूर्ण संसार के प्रति एक साक्षी भाव आ जाता है |

माँ कालरात्रि रक्तबीज का संहार करती है और उसका रक्त भूमि पर गिरे उससे पहले ही उसका पान कर जाती है | वैसे ही विकसित चेतना जब उर्ध्वगामी होती है तो सम्पूर्ण विचारों के प्रवाह को अतिक्रमण एवं दमन करते हुए एकाग्र होने लगती है | ऐसी अवस्था में योगी को ध्यान लगाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता यह स्वतः होने वाली क्रिया है | मन और अहंकार की दुनिया में प्रलय मच जाता है |


अष्टम माँ महागौरी


महागौरी-

महागौरी देवी का वास्तविक निज स्वरुप | योगी-साधक मन एवं विचारों के जटिल-जाल से बाहर निकल कर ही अपने निज स्वरुप का साक्षात्कार कर सकता है | जब मन विकारों से मुक्त हो जाता है तो स्वच्छ और निर्मल हो जाता है | चेतना गौरवर्णा है अर्थात निर्मल है | हम आदि शिव को भी "कर्पूर्गौर्म करुणावतारम" कहते हैं | 

पौराणिक कथा अनुसार एक समय भगवान् शिव ने पार्वती जी को काली कहकर संबोधित किया तब देवी को बहुत बुरा लगा और देवी ने निर्णय लिया कि मैं अपने काले वर्ण का त्याग कर दूंगी | और देवी पार्वती तपस्या करने चली गई | जहां से देवी का राक्छसो के वध करने का अभियान भी शुरू हो गया | सत्य तो यह है कि यह कहानी हर व्यक्ति की है हर योगी साधक की है | संसार के गुण-दोष से आहत होकर व्यक्ति मुक्ति का मार्ग ढूंढता है, और  योग मार्ग से अपने निज-स्वरुप जो कि गौरवर्ण-प्रकाश स्वरुप ज्योति स्वरुप है उसका साक्षात्कार करता है | 

मन एवं अहंकार पर विजय करते हुए ध्यान के तुरिया अवस्था में जो आत्म-साक्षात्कार होता है वही वास्तविक आत्म-साक्षात्कार  है | मन निर्मल हो जाता है | योगी मृत्युजयी हो जाता है | इन्द्रियातीत जगत को अनुभव करता है | फिर वह संसार में रहते हुए भी आसक्त नहीं होता | सांसारिक गुण दोष उसे प्रभावित नहीं करते  | मन जो पहले गुण दोष एवं अनेकानेक भावो के वशीभूत रूपांतरित होता रहता था अब उसका रूपांतरण रुक जाता है | मन अब निश्चल एवं निर्मल रहता है ; संसार के गुण दोष के वशीभूत कोई रूप धारण नहीं करता | योगी अनासक्त भाव से इस संसार में विहार करता है |  अतः चेतना की यह विशुद्ध अवस्था ही महागौरी का निश्चल निर्मल गौरवर्णा स्वरुप है |




नवम माँ सिद्धिदात्री


सिद्धि का तात्पर्य है, जीव के अस्तित्व की सम्पूर्णता की प्राप्ति | माँ सिद्धि दात्री सिद्धियां प्रदान करती है | कमल के पुष्प पर देवी का विराजमान होना आध्यात्मिक ज्ञान-भक्ति की पूर्णता का प्रतीक है | अतः देवी इस रूप में सिर्फ सृजन हीं करती हैं | लेकिन वह सृजन आध्यात्मिक होता है | देवी सिद्धिदात्री शांत एवं सौम्य रूप को धारण किये हुए रहती हैं |

 चेतना की उच्च अवस्था में योगी साधक अपने अस्तित्व के सम्पूर्णता का अनुभव करता है | चेतना  अपने विकास के शिखर को स्पर्श करती है | चेतना विकसित होकर सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर के बंधन को कमजोर कर देती है जिससे सूक्ष्म शरीर का विस्तार हो जाता है | चेतना इन्द्रियों के बंधन को तोड़ कर कार्य करने लग जाती है | योगी का मन स्थूल देह की ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) के परे भी अनुभूति करने लग जाती है | मात्र अनुभूतियाँ हीं नहीं जीव स्थूल हाड़-मांस के देह के परे होकर कर्म भी करने लग जाता है |

पतंजलि योग सूत्र में महर्षि पतंजलि कहते हैं - धारणा से लेकर समाधि तक तीनो को "संयम" भी कहा जाता है | यह संयम ही सिद्धियों का कारण है | योगी किसी भी तत्व के साथ संयम स्थापित कर उस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है | योगी का नियंत्रण पंचभूत - पृथ्वी , जल, वायु, अग्नि पर चलने लगता है | योगी मृत्युजयी हो जाता है | योगी अंतर्धान होने की शक्ति , अनेक रूप धारण करने की शक्ति, सूक्ष्म एवं विशाल होने की शक्ति, परकाया प्रवेश की शक्ति प्राप्त कर लेता | क्षणभर में संसार के किसी भी स्थान पर पहुँच जाने की शक्ति | अनेको शरीरी हो जाने की शक्ति | "योगी कथामृत" पुस्तक में श्री श्री परमहंस योगानंद जी द्विशारीरी संत का वर्णन करते हैं | सिद्ध योगी मृत शरीर में चेतना को प्रवाहित भी कर देने की शक्ति रखते हैं |  

जीव अपने अस्तित्व की पूर्णता को प्राप्त करता है लेकिन यह अवस्था मोक्ष या कैवल्य नहीं है | क्योंकि कैवल्य (समाधि) की अवस्था में जीव अपना अस्तित्व खो देता है | जीव ब्रह्म लीन हो जाता है फिर जीव का अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता है | फिर सिद्धियों का खेल भी नहीं रहता | अतः इसी कारण से महर्षि पतंजलि ने संयम-सिद्धि  के प्रयोग को अष्टांग योग का भाग नहीं माना क्योंकि योग का लक्ष्य समाधि है | और समाधि के लिए सिद्धियों का मोह त्यागना पडेगा है | समाधि तो विजय दशमी का उत्सव है |

नवदुर्गा-तत्व चर्चा

- मनीष देव

Monday, 11 September 2017

साधु और डेरा



साधु और डेरा
( यह दुनिया रैन बसेरा, यहाँ नहीं किसी का डेरा )






'साधु और डेरा' आज कल हमारे देश में इस विषय पर खूब चर्चा चल रही है | वैसे इन दोनों शब्दों के भावार्थ का दूर दूर तक समबन्ध नहीं बनता है; दोनों शब्द एक दुसरे के विरोधी हैं | “यह संसार नित्य परिवर्तन शील एवं चलायमान है”- ग्यानी ऋषियों के द्वारा ‘द्वैतवाद’ के सिद्धांत में भी प्रकृति को नित्य परिवर्तनशील ही परिभाषित किया गया है | ‘त्रैतवाद’ के सिद्धांत में जहां ईश्वर, प्रकृति और जीव के अस्तित्व को स्वीकारा जाता है, वहां भी प्रकृति को नित्य परिवर्तनशील ही बताया गया है | फिर वो साधू, संत और सन्यासी जो निरंतर इस संसार की परिवर्तनशीलता का उपदेश समाज को देते रहते हैं, वो कैसे इस नित्य परिवर्तनशील संसार में डेरा बना कर बैठ जायेंगे | अतः इसीलिए साधू और डेरा का सम्बन्ध विरोधात्मक है | लेकिन आज के वर्तमान समय में साधू को डेरा और संस्थान से जोड़ कर हीं देखा जा रहा है | आइये थोडा सनातन धर्म ग्रंथों में देखते हैं कि साधू और सन्यासी को कैसे परिभाषित किया जा रहा है | 
लिंगपुराण(10/11) के पूर्व भाग में कहा गया है –
 यतमानो यतिः साधु: स्मृतो योगस्य साधनात्।
एवमाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृतः ।।
-जो योग के साधनो में साधनारत हो कर धर्म में यत्नमान होता है वही यति है। आश्रम और धर्म के साधनो को जो साधते हुए व्रत-परायण रहता है, वह साधु कहा गया है।

ग्रहस्थो ब्रम्हचारी च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
धर्माधर्माविह प्रोक्तौ शब्दावेतौ क्रियात्मको ।।
-गृहस्थ, ब्रम्हचारी,वानप्रस्थ और सन्यास(परिव्राज) ये चारों साधु कहे गए हैं। जो नियमित रूप से चारो आश्रमों का पालन अनासक्त भाव से करे वो साधु ही कहलाता है | अर्थात जो नित्य यत्न पूर्वक निर्वाण की साधना में लगा हुआ है, वो साधु है | इस संसार को नित्य परिवर्तनशील समझते हुए, अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवन के अंत में सम्पूर्ण आशाओं का त्याग कर दे वो सन्यासी हो जाता है | वैदिक युग में ‘संन्यास’ जीवन का आखिरी समय है | वस्तुतः संन्यास वह मनोभाव है, जिसमे सन्यासी को इस परिवर्तनशील संसार से किसी प्रकार की कोई आशा नहीं रह जाती | ना कर्म कि और न ही कर्म-फल की | ना यश-अपयश की ना ही लाभ हानि की ना ही निर्माण की और ना ही विनाश की | ना ही दुनिया बदलने की कोई महत्वाकांक्षा | कोई उसे सुनेगा या नहीं सुनेगा कोई उसे मानेगा या नहीं मानेगा ;  सन्यासी इन भावों से मुक्त हो जाता है |

वेश भूषा और सांसारिक त्याग के नियम के अनुसार शास्त्रों में चार प्रकार के सन्यासी बताये गए हैं – कुटीचक्र, बहुदक, हंस एवं परमहंस | परन्तु आध्यात्मिक अवस्था के आधार पर सन्यासी के दो ही भेद बताये गए हैं – ‘तुरीयातीत’ एवं ‘अवधूत’ अवस्था जहां योगी को सम्पूर्ण संसार से अनासक्ति हो जाती है  |

मैत्रेय उपनिषद में बताया गया -
 वमनाहारवद्यस्य भाति सर्वेषणादिषु ।
तस्याधिकारः सन्यासे त्यक्तदेहाभिमानिनः।।18

एषणा अर्थात इच्छाप्राप्ति। एषणा वो है जो भी संसार में दिखाई देता हो, उनके प्राप्ति की इच्छा अथवा विश्व में विस्तार एवं प्रसार की इक्षा । समस्त प्रकार के धन प्राप्ति की इक्षा।  उपरोक्त सभी प्रकार की कामनाएं एवं इक्षाओं को वमन(उलटी) किये हुए आहार की भाँति जब लगने लगे । जिसने शरीर और नाम के सम्बन्ध से सभी प्रकार की ममता को नष्ट कर दिया है, उसे ही सन्यास का अधिकार है। श्रीमदभागवतमहापुराण के अवधूत-गीता प्रसंग में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि संत कभी संघ नहीं बनाते | सन्यासी का संगठन तो उसके इन्द्रियों का संगठन होता है |


परन्तु आज के परिवेश में साधु संतों की बड़ी बड़ी संस्थाएं और डेरे नजर आते हैं | संस्थान के प्रचार प्रसार और अपना झंडा गाड़ने की महत्वकांक्षा नजर आती है | और गुरु-भक्ति और गुरु-घर की सेवा के नाम पर खूब धन धान्य एकत्र किया जाता है | ज्यादा धन लाने वाले सेवकों को श्रेष्ट सेवक-भक्त घोषित किया जाता है, और सेवक भी मान सम्मान के मोह में उचित अनुचित का भेद भूल जाता है | मोक्ष, स्वर्ग और विश्व-शान्ति का स्वप्न सेवको को दिखा कर उन्हें संस्थानवाद का कूप-मंडूक बना दिया जाता है | भक्तो को लगने लग जाता है कि अब बहुत जल्द विश्व-शान्ति आ जायेगी और हमारा मोक्ष तो निश्चित हो गया है; सब कुछ शांत हो जाएगा और सनातन धर्म के द्वैतवाद का सिद्धांत झूठा हो जाएगा ! सत्य तो यह है कि जिसका मन शांत नहीं हुआ, उसके लिए विश्व-शान्ति कभी नहीं आने वाली | सेवक वर्ग गुरु भक्ति के नाम पर उतना ही पढता है, और उतना ही सुनता है, जितना गुरुपद के नाम पर संस्थान का मुखिया उन्हें बताता है | और एक बहुत बड़ा समूह गुरु-भक्ति के नाम पर घोड़े का चश्मा पहन लेता है | सत्य तो यह है कि संस्थान एक माध्यम हो सकता है, लक्ष्य नहीं ! लेकिन ये संस्थानवादी भक्त, राष्ट्र एवं शास्त्रों के संविधान से ऊपर अपने संस्थान के संविधान को मानने लग जाते हैं |

अतः आज अति आवश्यक है कि साधु, सन्यासी एवं धर्म की शास्त्र-सम्मत परिभाषाओं को फिर से समझा जाए |

-मनीष देव  

Monday, 28 August 2017

SAW - LNMI PATNA


SAW-Self Awakening Workshop at LNMI-Patna



In present era  students and youth society is facing many problems due to competitive circumstances. In this competitive world of today young minds are facing many psychological arrests. After getting professional degrees (MBA, MCA, B-tech) from renowned universities they face competition for Job in Job-Market. But there is lot of difference between educational life and market life.  Sometimes they face failure in competition and sometimes they face humiliations in hierarchy system of Job. Youth are facing many problems like financial problems, work place stress, and relationship stress. And due to this they are facing many type of mental illness like depression, anxiety, insomnia, suicide, eating disorder, addiction and many more psychosomatic diseases. 
                            
Keeping this problem in priority Divya Srijan Samaaj (DSS) designed a program named SAW (Self Awakening Workshop) to make people free from this type of mental-agony. This revolutionary program is based on ASHTAANG-YOG concept of PATANJALI YOG-SUTRANI.
Divya Srijan Samaaj conducted this program at LNMI-PATNA (L N Mishra institute of economic development and social changes) a renowned college of Management in North India. Coordinator of LNMI-Patna Dr S. D. Singh (Professor) organized this program in auditorium of College for MBA & MCA students.


Shri Manish dev (Gen. Secretary) of Divya Srijan Samaaj is a Spiritual Preacher, Mind power trainer, Sub-conscious trainer, motivational/ Spiritual speaker and also a writer for this topic. Shri Dev delivered his lecture and presentation on Thought-process, Sub-conscious mind and Meditation in three days SAW program of LNMI-Patna from 17 to 19 august 2017. This Program proved like a boon for young minds of LNMI-Patna.


Along with this Dr. Paresh sheth director of English dot com (from Mumbai)  delivered his lecture on Communication-skill and  Interview-facing for students.


In the end Dr. Chandra (Senior Professor) of LNMI-PATNA delivered vote of thanks.  
          

Thursday, 10 August 2017

अहिंसावादी श्री कृष्ण


अहिंसावादी श्री कृष्ण
(मनीष देव)





‘हिंसा’ और ‘अहिंसा’ इस विषय को लेकर प्रायः हमारे देश में चर्चा चलती रहती है | ‘हिंसा’ क्या है ! और ‘अहिंसा’ क्या है ! हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग, पत्रकार समुदाय, एवं नेतागण अपना-अपना पक्ष रखने के लिए कभी संविधान तो कभी धर्म का आधार, या फिर बापू महात्मा गांधी, महात्मा बुद्ध एवं तीर्थंकर महावीर के नाम का आधार लेते रहते हैं | पाश्चात्य संतों का नाम भी कुछ लोग ले लेते हैं | लेकिन, जब अहिंसा को उपमा देनी हो तो उन्हें दूर-दूर तक श्री राम और श्री कृष्ण का नाम याद नहीं आएगा | गलती से किसी को ईस विषय पर भाषण-प्रवचन देते हुए याद भी आ जाए तो वह अपनी बुद्धिजीविता की अस्मिता को बचाने के लिए श्री राम एवं श्री कृष्ण के नाम को अपने भाषण-प्रवचन में से वैसे ही निकाल बाहर करता है, जैसे भोजन करते हुए तीखेपन के स्वाद से बचने के लिए स्वादिष्ट सब्जी में से भी व्यक्ति हरी मिर्च को चुन-चुन कर बाहर निकाल देता है, लेकिन फिर भी कभी सब्जी में हरी मिर्च डालने का विरोध नहीं करता | प्रश्न करने पर उत्तर देता है कि हरी मिर्च स्वास्थय-वर्धक एवं आवश्यक है, परन्तु उसके तीखेपन से बचने के लिए उसे बाहर निकालना पड़ता है, नतीजा ! हमेशा कडवेपन से बचने की यह आदत उन्हें वैचारिक अथवा राजनैतिक मधुमेह से ग्रसित कर देती है | जिनका यह चर्चित मधुमेह थोडा कम हो और उनके सामने अहिंसा को परिभाषित करने के लिए मात्र दो विकल्प श्री राम और श्री कृष्ण का ही दिया जाए तो वह श्री राम को चुन कर श्री कृष्ण को निकाल बाहर करेंगे, और बोलेंगे “उसने तो जन्म लेते हीं हिंसा शुरू कर दी थी” |  तो फिर यह लेख इन वैचारिक अथवा राजनैतिक मधुमेह से ग्रसित बुद्धिजीवियों के लिए औषधि के रूप में प्रस्तुत है |

आज हम अहिंसावादी श्री कृष्ण की ही चर्चा करेंगे | वैसे तो योगेश्वर श्री कृष्ण की सम्पूर्ण जीवन-लीला हीं अहिंसा और प्रेम से भरा है | महाग्रंथ ‘महाभारत’ के महानायक श्री कृष्ण अहिंसा के आदर्श हैं, और महाभारत स्वयं अहिंसा का ग्रन्थ है | यह सत्य है कि महाभारत में युद्ध की गाथा है, परन्तु महाभारत का उपदेश अहिंसक है | महाभारत के अनुशाषण-पर्व में लिखा गया है :- 

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः | अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ||२३|| अध्याय 115 दानधर्म पर्व | 

-अर्थात अहिंसा हीं परम धर्म है और अहिंसा ही परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य जिससे धर्म की प्रवृति आगे बढती है | महाभारत के अनुशाषन पर्व के अध्याय 60 में अहिंसा को परिभाषित करते हुए लिखा गया :- 

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः| दमस्त्यागो धृति सत्यं भवत्पवभ्रिताय ते ||18|| 

- अर्थात, सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सौंपना, इन्द्रिय संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना पुण्यदायी ही है | यही अहिंसा की परिभाषा है, और यही योगेश्वर श्री कृष्ण के जीवनलीला-चरित्र में दृष्टिगोचर होता है |

हिंसा और अहिंसा के भी दो क्षेत्र हैं, जहां हम इनका मूल्यांकन करते हैं | प्रथम क्षेत्र है व्यक्तिगत जहां हमें मन, कर्म एवं वाणी से अहिंसक बनना है, अर्थात सर्वप्रथम हमारी भावनाएं अहिंसक होनी चाहिए | दुसरा क्षेत्र है- सामाजिक जहां पर संविधान, न्याय और निति से अहिंसक होना पड़ता है | श्री कृष्ण दोनों ही क्षेत्रों में धर्मधुरंधर थे, अर्थात परम अहिंसक थे | अहिंसक संविधान वही हो सकता है जो हिंसा को बढ़ावा ना दे और साथ हीं हिंसा फैलाने वाले को भी बढ़ावा ना दे | श्री कृष्ण ने किस प्रकार अहिंसा को चरितार्थ किया आइये इसे समझते हैं |

गोकुल का सारा दूध, दही और माखन कर के रूप में मथुरा के राजा कंस के पास चला जाता था | उधर कंस की रानियाँ दूध में नहाती थी और गोकुल के ग्वाल-बाल कुपोषण के शिकार हो रहे थे | तब बाल-कृष्ण ने एक आनंदित कर देने वाला बाल आन्दोलन चलाया और माखन-चोरी लीला प्रारम्भ कर दी, जो बिलकुल अहिंसक थी और ग्वाल बालों को उनका हक दिलाती थी | लेकिन इस लीला का परिणाम यह हुआ कि कंस को गोकुल से मिलने वाले दूध दही में कमी आने लगी और कंस के अत्याचार बढ़ने लगे | कंस अपने कई हिंसक असुर दूतों को गोकुल वासियों पर अत्याचार करने के लिए भेजने लगा | तब गोकुल वासियों की रक्षा हेतु श्री कृष्ण ने कुछ हिंसक नरपशुओं का वध भी किया क्योंकि उनका जीवन हिंसा को ही समर्पित था | फिर श्रीकृष्ण ने हिंसा से बचने के लिए हीं गोकुल छोड़ वृन्दावन में जाने का निर्णय लिया | सारे गोकुल वासी कंस के द्वारा फैलाई गयी हिंसा से बचने के लिए ही गोकुल से वृन्दावन पलायन कर जाते हैं | लेकिन कंस की नजरों से ज्यादा दिन तक नहीं बच पाते | कंस का अत्याचार वहां भी शुरू हो जाता है | तब तक ग्वाल बाल भी बड़े हो जाते हैं | सब श्री कृष्ण के नेतृत्व में खड़े होकर कंस से लोहा लेने का निर्णय लेते हैं, तब श्री कृष्ण अपने मित्रों से यही कहते हैं कि – “युद्ध से कभी कोई लाभ नहीं मिलता कंस का काल ही उसे एक दिन मारेगा” | और स्वयं कंस ही कृष्ण को मलयुद्ध में बुलाता है, और उसी मलयुद्ध में श्री कृष्ण के द्वारा कंस वध होता है, और समाज को अभयदान प्राप्त होता है | कंस वध होते ही कंस के सारे संगी-साथी श्री कृष्ण के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं | ज़रा संघ और कालयवन दोनों मिलकर मथुरा पर आक्रमण कर देते हैं | तब योगेश्वर श्री कृष्ण देखते हैं कि अगर यह युद्ध हुआ तो बहुत भयानक हिंसा होगी, मथुरा की निरीह निरपराध जनता मारी जायेगी |  तब श्री कृष्ण ने देखा कि इस युद्ध का कारण मात्र मैं हूँ, अगर मैं बीच से हट गया तो ये युद्ध टल जाएगा और हिंसा रुक जायेगी | तब श्री कृष्ण ने मात्र अहिंसा के लिए युद्ध भूमि को छोड़ा और “रणछोड़” कहलाये और साथ ही युद्ध भी टल गया | 

 श्री कृष्ण ने द्वारिका में अपना राज्य स्थापित किया | उधर हस्तिना पुर में ध्रितराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन अपने मामा सकुनी के साथ मिलकर अनेक प्रकार के षड्यंत्र कर रहा था पर-स्त्री और पर-धन ही उसके जीवन का लक्ष्य बन गया था | दुर्योधन ने छल-कपट से चौरस के खेल में पांडवों को हरा कर उन से सब कुछ छीन लिया | और उनकी भार्या द्रौपदी को अपनी दासी बना लिया और सारी मर्यादाओं को लांघते हुए हिंसक दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की आज्ञा दे दी | भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर ध्रितराष्ट्र सभी उस सभा में बैठे थे, लेकिन दुर्योधन को रोकने में सब असफल हुए | यह भयंकर और मानवता को कलंकित करने वाली हिंसा हस्तिनापुर के राजसभा में हो रही थी, लेकिन बड़े बड़े धर्म धुरंधर बैठे हुए थे, परन्तु सब अपने व्यक्तिगत धर्म  की रक्षा में लगे हुए थे | और पांडवों ने भी अहिंसक प्रवृति को ही अपनाया हुआ था | इसके बाद मात्र एक द्युत-क्रीडा के हार और जीत के आधार पर पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञात-वास की सजा सुनाई गई, जो कि अन्याय पूर्ण था | अहिंसा का व्रत पालन करने वाले धर्मवीर पांडवों ने इसे स्वीकार कर लिया | वनवास में भी उनके साथ कई अत्याचार किये गए | 13 वर्षों में कई बार दुर्योधन ने पांडवों का वध करने का प्रयास किया, लेकिन पांडव श्री कृष्ण की कृपा से बचते गए | हस्तिनापुर में भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर, और ध्रितराष्ट्र सब ने पांडवों को विश्वास दिलाया था कि 13 वर्ष बाद उनका अधिकार उन्हें प्राप्त हो जाएगा, परन्तु दुर्योधन इसके लिए तैयार नहीं था | पांडव और श्री कृष्ण युद्ध की विभीषिका को अच्छी तरह समझते थे, इसलिए वो शांतिपूर्ण ढंग से ही अपना अधिकार मांग रहे थे | लेकिन दुर्योधन बस एक ही रट लगाए हुए था कि युद्ध करो और अपना अधिकार ले जाओ | 

जब दुर्योधन को समझाते हुए सब हार गए तब श्री कृष्ण ने हीं दुर्योधन को समझाने की जिम्मेदारी ली | तब द्वारिकाधीश श्री कृष्ण एक राजा होते हुए भी दुर्योधन के समक्ष एक शान्ति दूत बन कर गए | और दुर्योधन से कहा “दुर्योधन तुम अगर पांडवों को आधा राज्य नहीं देना चाहते तो उन्हें पांच गाँव हीं दे दो, अगर उसमें भी आपत्ति हो तो पांच गृह ही दे दो, वो उसी में संतोष कर लेंगे |” तब दुर्योधन ने उत्तर देते हुए कहा “पांच गाँव और पांच गृह तो बहुत दूर की बात है, अगर सुई के नोक के बराबर भूमि भी चाहिए तो युद्ध के मैदान में आओ और युद्ध लड़ो ! अगर अपने प्राणों की भी रक्षा करनी है तो युद्ध लड़ो  |” श्री कृष्ण के बहुत समझाने पर भी दुर्योधन नहीं माना उल्टा श्री कृष्ण का ही अपमान करते हुए श्री कृष्ण को ही बंधी बनाने की आज्ञा देदी |  तब श्री कृष्ण ने कहा “ठीक है दुर्योधन ! अब युद्ध के अलावा तुमने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा, अब तो पांडवों को अपनी आत्म रक्षा हेतु भी युद्ध हीं करना पड़ेगा |”

कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि श्री कृष्ण ने ही महाभारत का युद्ध करवाया, अगर श्री कृष्ण चाहते तो युद्ध रोक लेते | परन्तु किसको रोकते ! श्री कृष्ण सिर्फ पांडवों को ही युद्ध करने से रोक सकते थे, अगर पांडव युद्ध नहीं करते तो भी दुर्योधन तो युद्ध करता ही, और पांड्वो की हत्या के लिए आतुर रह्ता | अगर महाभारत का युद्ध नहीं होता तो क्या परिस्थिति बनती इस पर भी विचार करना आवश्यक है | सर्व प्रथम, दुर्योधन तो द्रौपदी का सामूहिक शील-हरण ही करता और फिर पांडवों की हत्या, और फिर पांडव समर्थको की हत्या | और जो व्यक्ति पर-नारी और पर-धन का हरण करने में विश्वास करता है, वह तो हिंसा, अन्याय और अनीति का ही प्रसार करेगा | और क्या ! अहिंसक होने का यही तात्पर्य है कि अत्याचार को सहो और हिंसा करने वाले नरपशुओं को हिंसा करने की पूरी स्वतन्त्रता दे दो | श्री कृष्ण सामाजिक अहिंसा का अर्थ अच्छे से समझते थे, और समाज के प्रति जिम्मेदार थे | वह देख चुके थे कि दुर्योधन को रोका नहीं जा सकता, और अच्छा तो यही होगा कि यह पृथ्वी ऐसे हिंसक लोगो से मुक्त ही हो जाए, तभी धार्मिक एवं अहिंसावादियों का जीवन इस धरती पर सुरक्षित हो पायेगा |


आज हमारे देश में भी ऐसे कुछ बुद्धिजीवी पत्रकार, लेखक  और राजनेता हैं, जो एक वर्ग को अहिंसा का पाठ पढ़ाने में लगे रहते हैं और दुसरे वर्ग के द्वारा किये गए हिंसा पर टिपण्णी विहीन हो जाते हैं | सत्य तो ये है कि सामाजिक अहिंसा, न्याय और निति की रक्षा हेतु व्यर्थ ही अपने स्वार्थ के लिए हिंसा करने वालों को प्रतिबंधित करना ही चाहिए, यही श्री कृष्ण का “अहिंसावाद” है |            

Tuesday, 8 August 2017

Divya Srijan Samaaj


दिव्य सृजन समाज

दिव्य सृजन समाज एक आध्यात्मिक-सामाजिक कल्याणकारी संस्था है,जो कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत रजिस्टर्ड है | दिव्य सृजन समाज पिछले दो वर्षों से आध्यात्मिक जागृति, योग, युवा विकास, नशा मुक्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, कला-संस्कृति, सामाजिक-समरसता एवं नारी सशक्तिकरण जैसे समाज कल्याण के कार्य में कार्यरत है |

दिव्य सृजन समाज का विश्वास है कि बिना आत्म जागृति के समाज में कोई ठोस सुधार नहीं लाया जा सकता अतः सर्वप्रथम लोगों को अपने मन एवं आत्मा से जागृत होना पड़ेगा | भीतर जागृति आएगी तभी बाहर भी परिवर्तन आएगा | Self Awakenig Workshop (SAW) आत्म जागृति कार्यक्रम, एक ऐसा ही कार्यक्रम है जो लोगों को सबसे पहले स्वयं के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है एवं स्वयं के प्रति जागरूक होने की विधि भी बताता है | आज का मनुष्य अनेकों मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त है | ज्यादातर मानसिक व्याधियां ही शारीरिक व्याधियों में परिवर्तित हो जाती हैं अतः सबसे पहले मन एवं मन में चलने वाले विचारो के प्रति जागरूक होना पड़ेगा, जब मनुष्य मन से संतुलित होगा तो बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसे आसानी से मिल जाएगा | और यह सब तभी संभव है जब वह आध्यात्मिक ज्ञान से पोषित हो अपने भीतर ही अपने आत्म-स्वरुप का साक्षात्कार कर ले |

अतः दिव्य सृजन समाज, समाज सेवा के इस कार्य को करने के लिए अलग अलग क्षेत्रों में अनेको कार्यक्रम एवं शिविरों का आयोजन करता रहता है | इन शिविरों में भाग लेने वाले लोग अपने जीवन में मानसिक शान्ति एवं मानसिक संतुलन को प्राप्त होते हैं | अपने जीवन के कई समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होते हैं |  

दिव्य सृजन समाज- 
संपर्क सूत्र :- 9661802459divyasrijansamaj@gmail.com
divyasrijansamaaj.blogspot.com      

Monday, 31 July 2017

धार्मिक राजनीती / religious politics


धार्मिक-राजनीति


लेखक- मनीष देव

“धर्म की राजनीति” - वर्तमान में इन शब्दों का प्रयोग हम अपने देश में प्रायः सुना करते हैं, कभी नेताओं के भाषण में तो कभी लेखकों के लेख में या फिर पत्रकारों की पत्रकारिता अथवा समाचार में | प्रायः लोगो को कहते हुए सुनते हैं कि धर्म की राजनीती नहीं होनी चाहिए अर्थात राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म का प्रयोग नहीं होना चाहिए | यधपि, आज हम चर्चा ‘धर्म की राजनीति’ नहीं अपितु 'धार्मिक-राजनीती' पर करेंगे | धर्म की राजनीति के स्थान पर अगर धार्मिक-राजनिति हो, तो फिर दृश्य परिवर्तित हो जाते हैं | और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि राजा अथवा राजनेता अपनी प्रजा की नज़र में एक आदर्श के रूप में होता है | और अगर वह आदर्श धार्मिक गुणों(धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, धी, विद्या, सत्य आदी धर्म के 10 गुण बताये गए हैं) से अलंकृत ना हो, तो प्रजा और राष्ट्र को पतन के मार्ग पर ले जाएगा | इसको समझने के लिए धर्म और राजनीति के मौलिक अन्तर को समझना होगा | राजनीति जीवों के सामाजिक विकास की बाह्य प्रकृति है | और धर्म मनुष्य की चेतना के विकास की अन्तः-प्रकृति है | राजनीति अन्य जीवों में भी पायी जाती है जैसे बन्दर, भेड़, कुत्ता, आकाश में उड़ने वाले पक्षी ये सब भी अपना मुखिया अथवा नेता चुनते हैं | परन्तु धर्म मनुष्य जाती का ही महत्वपूर्ण स्वभाव है | अगर हम धर्म और राजनीति दोनों को पृथक पृथक समझ जाएँ तो पता चलेगा धर्म की राजनीति संभव ही नहीं है | धर्म के नाम पर धार्मिक विकृतियाँ अथवा धार्मिक मान्यताओं और सम्प्रदाय की राजनीति ही हो सकती है लेकिन धर्म की राजनिति संभव नहीं है | परन्तु, धार्मिक-राजनीती संभव भी है और होनी भी चाहिए | सत्य तो यह है कि राजनीति और धर्म का सम्बन्ध तो लक्ष्मी-नारायण का सम्बन्ध है, जहां पर नारायण धर्म के प्रतीक हैं और लक्ष्मी जी धर्म-पालन करते हुए श्रीनारायण की चरण सेवा में लगी हैं, वह राजनीति के प्रतिक स्वरुप में हैं | दूसरा उदाहरण हम विद्युत के उपकरण का भी ले सकते हैं- जैसे विद्युत उपकरण को क्रियाशील करती है लेकिन उपकरण बिजली को नहीं | यह विद्युत धर्म स्वरुप है | राजनीति का सर्वोत्तम सदुपयोग धर्म-रक्षा एवं धर्म-पालना ही है अतः सर्वप्रथम राजा का धार्मिक गुण संपन्न होना अनिवार्य है, अन्यथा राजा फिर अपने राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म की राजनीति शुरू कर देता है | हमारे प्राचीन इतिहास में ऐसा ही एक प्रसंग मिलता है जो इस विषय को और भी स्पष्ट कर देता है |



शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के जन्म के समय हीं यह भविष्यवाणी हो गई थी कि वह एक विश्व-स्तरीय महान सम्राट या फिर महान साधू बनेंगे | सत्य तो यह है कि महात्मा बुद्ध दोनों हीं बन गए साधू वह अपरोक्ष रूप से थे और सम्राट परोक्ष रूप से | महात्मा बुद्ध का धम्म-प्रचार उनके रहते हीं इतना विस्तारित हुआ कि बिना किसी राजनैतिक लक्ष्य के भी बुद्ध के धम्म ने राजनितिक रूप धारण कर लिया | उत्तर भारत के कई राजा अपने साम्राज्य के साथ बुद्ध के अनुयायी बन गए, अर्थात वह बुद्ध के दिए दिशा निर्देश से ही अपने राज-धर्म का पालन करते थे | मगध, कोसल, काशी, अंग, वैशाली, बंग, कलिंग और कौशाम्बी भी भगवान् बुद्ध के आध्यात्मिक आलोक से आलोकित एवं प्रेरित हो रहे थे | मगध नरेश बिम्बिसार एवं कोसल नरेश प्रसेनजीत तो बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बन गए थे | बुद्ध बिना किसी राजभवन के राज-गद्दी पर बैठे वन विहारों में कुश के आसन पर बैठ कर ही सभी राजाओं एवं उनकी प्रजा को राजधर्म-निर्देश देते थे | उनके अनुयायी राजा उनके निर्देशों का पालन किसी सम्राट की आज्ञा की भाँती ही करते थे बस अन्तर इतना था कि बुद्ध उनके ह्रदय के भी सम्राट थे | बुद्ध के शरण में कई राजा धार्मिक राजनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे | वैदिक मतों के अनुसार भी राजाओं को धर्मोपदेश सुनना अनिवार्य था | समय बिता, और बिम्बिसार के हर्यक वंश के बाद शिशुनाग वंश और फिर नन्द वंश का समय आया नन्द वंश का नौवां राजा धननंद बहुत अत्याचारी और भोग-विलासी था | उसका आचरण धर्म-विरुद्ध एवं मानवता-विरुद्ध था | तब उसका विरोध मगध के आचार्यों ने अहिंसक रूप से किया | परन्तु हिंसा के पुजारी धननंद ने शस्त्र-बल से इस विरोध का दमन कर दिया | उस समय आचार्य चणक के पुत्र चाणक्य जो कि तक्षशीला विद्यापीठ के कुलपति भी हुए उन्होंने अपने भाषण-प्रवचन से राजा के विरुद्ध प्रजा को जागृत करना शुरू किया | उसी समय धननंद ने धर्म की राजनीति शुरू की | धननंद ने देखा कि उसका विरोध ब्राह्मण आचार्यों एवं गुरुकुल में रहने वाले ब्रह्मचारियों के द्वारा हीं किया जा रहा है | तब धननंद ने बौद्ध भिक्षुओं की बड़ी बड़ी सभाएं आयोजन करवाई | और प्रजा के बीच घोषणा करवा दिया कि “अब गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को कोई भिक्षा नहीं देगा ! भिक्षा के अधिकारी मात्र बौद्ध भिक्षुक होंगे ये भिक्षुक उन ब्रह्मचारियों से श्रेष्ट हैं” | कुछ समय तक मगध की जनता मानने लगी कि उनका राजा धार्मिक हो गया है | परन्तु उस समय ब्राह्मण वर्ग और भिक्षुक वर्ग में किसी प्रकार का मतभेद नहीं था और आचार्य चाणक्य तो स्वयं बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बनने में विश्वास करते थे, अंततः बौद्ध भिक्षुओं ने आचार्य चाणक्य का ही साथ दिया और धननंद को हटा चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया गया | तब चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को अपने राज्य में बिना किसी भेद भाव के उचित एवं सम्मानित स्थान प्रदान किया और धार्मिक-राजनीति का ज्वलंत प्रमाण प्रस्तुत किया | उसी प्रकार मौर्य-वंश का अंतिम राजा बृहद्रथ धर्मच्युत एवं विलासी हो गया तब महर्षि पतंजलि ने उसे हटा अपने शिष्य पुष्यमित्र शुंग का राज्याभिषेक एक धार्मिक-राजा के रूप में किया |

अतः आज हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियों में जन-मानस को यह समझना आवश्यक है कि ‘धर्म की राजनीति’ एवं ‘धार्मिक राजनीति’ में बहुत अन्तर है | नहीं तो कोई धन का लोभी धननंद धर्म और जाती के नाम पर हमें विभाजित कर के फिर से हमें ठग सकता है | 

--मनीष देव

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna-

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna- https://youtu.be/lGb7E-LBo14