Friday, 22 September 2017

नव दुर्गा- तत्व चर्चा


प्रथम शैलपुत्री -




शैल का अर्थ है उच्चत्तम शिखर| चेतना ही जीव के अस्तित्व का कारण है | यह संसार जड़ और चैतन्य से बना है | पर्वत वैसे तो जड़ तत्व है | देवी पर्वत पुत्री के नाम से जानी जाती हैं अतः उन्हें शैल पुत्री भी कहते हैं | लेकिन जीव जगत का शिखर उसमें निहित चेतना है जो जीव अस्तित्व का कारण है | परन्तु इसके अन्दर निहित चेतना  की ऊर्जा अपने शिखर पर होती है, केवल तभी आप शुद्ध चेतना या देवी रूप को देख, पहचान और समझ सकते हैं| उससे पहले, आप नहीं समझ सकते, क्योंकि इसकी उत्त्पति शिखर से ही होती है – 
जब ऊर्जा अपने शिखर सहस्रार पर पहुंच जाएगी तो मानवीय चेतना को सर्व्यापी कर देगी । सारे बंधन नष्ट हो जाएंगे । साधक निर्विचार निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त करेगा । चैतन्य शक्ति को उर्ध्वगामी करना ही योग साधना का लक्ष्य होता है । यह शक्ति चेतना के रूप में हमारे अंदर कार्य करती है । मन बुद्धि चित्त अहंकार और यह स्थूल शरीर सब चेतना की शक्ति से ही क्रियाशील रहती हैं, लेकिन बन्धनयुक्त होकर । परंतु जब ऊर्जा उर्ध्वगामी हो तो यह सारे बंधनो को नष्ट कर साधक को परम ज्ञान एवं परमानंद का अनुभूति करवाती है । अतः देवी शैलपुत्री चेतना के विकसित शिखर की स्वरुप हैं | देवी स्वयम चेतना-रूप में हर जीव के भीतर विधमान हैं |



द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी
माँ ब्रह्मचारिणी -


ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ जिस देवी का आचरण ब्रह्ममय हो। ब्रह्मचारी होने का भी यही तात्पर्य है । सामान्यतः लोग ब्रह्मचारी होना अर्थात अविवाहित होना समझते हैं । अतः यहां ब्रह्म के आचरण एवं ब्रह्म की स्थिति को समझना आवश्यक है । ब्रह्म वो है जो सर्व व्यापी तत्व है । ब्रह्म भावातीत है - अर्थात भावनाओं और विचारों के परे है । त्रिगुणातीत है - अर्थात तीन गुण- सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के वशीभूत नहीं होता । ब्रह्म में किसी भाव का प्रवाह नहीं है, वह भावातीत है।
ना सुख-दुःख, न द्वेष-प्रेम, ना लाभ-हानि, ना जय-पराजय, । ब्रह्म-आचरण करने वाला इन द्वैत भावों को धारण नहीं करता अर्थात किसी भाव के वशीभूत नहीं होता है । वह भावनाओं एवं विचारों से ऊपर उठ कर मात्र परमात्मा में ही उसका मन रमन करता है । ब्रह्मचारी का मन अनेक भावों एवं विचारो में रूपांतरित नहीं होता । ब्रह्मचारी निजस्वरूप में ही स्थित होकर आनंदित होता रहता है ।
जब योगी मन की ऐसी अवस्था को प्राप्त करे तभी वह ब्रह्मचारी है। सन्यासी है ।


तृतीय माँ चंद्रघंटा


माँ चंद्रघंटा -
चंद्र मन का प्रतीक है । और घंटा नाद का ।
वैसे तो हमारे मन का घंटा तो मंदिर के घंटे की तरह बजता रहता है । कभी कोई बजा कर चला जाता है तो कभी कोई । हम अपने जीवन में आने वाले परिस्थितियों एवम विचारों से प्रभावित होते रहते हैं । हमारा मन अनेको रूप धारण करता रहता है । मान लीजिए हमारा किसी से छोटा सा झगड़ा हो गया तू-तू मैं-मैं हो गया । झगड़ा तो 5 मिनट के लिए हुआ लेकिन मन के भीतर यह झगड़ा कई घंटों तक चलता रहेगा । और मन अशांत रहेगा । बाहर का झगड़ा बस 5 मिनट के लिए लेकिन भीतर का झगड़ा कई घंटों तक चलता है । हम अपने मन में ही झगड़ते रहते हैं ।
अतः मन की इस खिटपिट से आज़ादी मिले तो जीवन आनंदित हो पायेगा । नहीं तो अनेकानेक विचारो एवं भावनाओं के वशीभूत मनुष्य का मन अनेको रूप धारण करता रहता है । अतः विचारों पर नियंत्रण एवं विचारातीत अवस्था को प्राप्त करना ही आध्यात्म एवं योग का लक्ष्य है । महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में लिखा है -
योगश्चित्तवृति निरोधः ।।
अर्थात चित्त वृति का निरोध ही योग का लक्ष्य है। अतः मनुष्य को धारणा - ध्यान का अभ्यास करना चाहिए ।
ध्यान की विधियों एवम अवस्थाओं में एक 'नाद-ध्यान' की अवस्था है । इस ध्यान में साधक अंतर्निहित दिव्य नाद-संगीत को सुनता है । इस नाद ध्यान में मन की स्थिति हो जाने से मन बहुत तीव्रता से निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने लग जाता है । मन बहुत जल्दी शांत होने लग जाता है । लेकिन यह नाद बिना किसी विधि सहारे के सुनाई देने लगे तभी कल्याणकारी है । और योगी अति शीघ्रता से निर्विचार एवं परमानंद की अनुभूति करवाता है ।
शिवमहापुराण कथनानुसार दो घड़ी तक पूरी एकाग्रता से इस नाद का ध्यान करने वाले योगियों में शिव की शक्ति आ जाती है ।
अतः देवी माँ चन्द्रघंटा का यह दिव्य रूप एवम नाम उस नाद ब्रह्म की अनुभूति एवं परमानंद एवं शिवशक्ति का ही प्रतीक है ।




चतुर्थ माता कुष्मांडा




माता कुष्मांडा -
'कु ' का अर्थ है छोटा अथवा सूक्ष्म, 'ईश ' का अर्थ है सर्वव्यापी चैतन्य शक्ति और अंड का अर्थ है यह ब्रह्मांडीय सृष्टि/ ब्रह्मांड ।
ईश्वरीय शक्ति सर्वव्यापी है । जीवो में चेतना ही ईश्वरीय शक्ति की अभिव्यक्ति । मन बुद्धि चित्त अहंकार, पाँच ज्ञाननेंद्रिया एवं 5 कर्मिन्द्रियाँ ये सब चेतना की शक्ति से क्रियाशील होते हैं । चेतना बहुत ही सूक्ष्म रूप में हैं । लेकिन शक्ति स्वरूप है ।
जड़-चेतना से मिलकर ही सृष्टि बनी है । और देवी कुष्मांडा का यह रूप सृजनात्मक ही है । ब्रह्मांडीय सृजन का प्रतीक है । देवी सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में सृजन हेतु धारण करती है । और यह सृजन की क्रिया नित्य चलती रहती है । चेतना की शक्ति से ही सारे सृजन कार्य संभव होते हैं ।
अतः योग-साधना का लक्ष्य चेतना की शक्ति को विकसित करना ही है । विकसित चेतना सृष्टि करती है । अतः सिद्ध योगियों में सृष्टि करने और इंद्रियों से परे कर्म करने की क्षमता होती है ।
अतः माता कुष्मांडा ब्रह्मांडीय सृजन की देवी हैं। सम्पूर्ण ब्राह्मांड उनके चैतन्य-गर्भ में सृजन हो रहा है ।



पंचम देवी स्कंदमाता



माँ स्कन्द माता
पंचम देवी स्कंद माता के नाम से जानी जाती हैं ।
स्कन्द का अर्थ होता है 'क्षरण' अथवा 'विनाश' ।
एक ओर जहां माता कुष्मांडा सृजन की देवी तो दूसरी ओर देवी स्कन्द माता क्षरण अथवा विनाश की देवी है ।
योगी की चेतना जब उर्ध्वगामी होती है तो एक ओर जहाँ सृजन शक्ति का विकास होता है तो वहीं दूसरी ओर जड़त्व अथवा तामसी शक्तियों का (inertiative power) का विनाश भी शुरू हो जाता । साधक की तामसी वृतियाँ कमजोर पड़ने लगती हैं । उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगता है ।
यह क्रिया बाह्य प्रकृति एवं अन्तः प्रकृति दोनो में चलती है । प्रकृति जब असंतुलित होती है तो क्षरण करती है । अर्थात प्रलय लाती है । अतः माँ स्कंदमाता ईसी क्षरण, प्रलय, अथवा विनाश की सूत्रधार हैं ।
और इसी तामसिकता एवं जड़त्व के विनाश हेतु भगवान कार्तिकेय का जन्म होता है। जो कि एक विकसित चेतना के प्रतीक है। जो सदैव बाल रूप धारण करने वाले ब्रह्मचारी हैं । विकसित चेतना वाले योगियों का स्वभाव भी बालक जैसा ही होता है । और ब्रह्मचर्य भी उनका स्वभाव ही होता है ना कि कोई व्रत । ब्रह्मचर्य तभी सफल है जब स्वभाव-प्रकृति में आ जाये ।
अतः भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर जो कभी मरना नहीं चाहता था उसका वध कर के तामसिकता/जड़त्व का विनाश किया ।
जब भगवान स्कन्द(कार्तिकेय) कैलाश छोड़ कर दक्षिण भारत में शैल पर्वत पर योगसमाधि में लीन हो चले गए तब माता पार्वती मोह वश हठपूर्वक शिव जी के साथ पुत्र से मिलने वहाँ गई थी । तब भगवान स्कन्द ने देवी को ब्रह्म-तत्व का उपदेश कर मोह भंग किया था। वह स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है ।
अतः स्पश्ट हो जाता है कि देवी का यह रूप जड़ता एवं तामसिकता के विनाश का अभिप्राय है । और विकसित चेतना के रूप में भगवान स्कन्द ही विराजमान हैं ।

माँ कात्यायनी

षष्ठम माँ कात्यायनी:-
स्कन्द महापुराण के वर्णन अनुसार परमेश्वर के क्रोध से देवी कात्यायनी का प्राकट्य हुआ | देवी कात्यायनी ने ही सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध किया | कात्यायनी अच्छाई और धर्म का क्रोध है जो सब कुछ सहते हुए अंततः प्रगट होता है | पांडव आजीवन अत्याचार सहते रहे परन्तु अंततः युद्ध को न रोक पाएं |
कात्यायनी चेतना का वह तीव्र वेग है जो योगी साधक की सम्पूर्ण सांसारिक वृतियों का नाश अति शीघ्रता से करती | कात्यायनी दमनकारी है, और सांसारिक तामसिक वृतियों का अतिक्रमण करती है | पानानी के भाष्य को लिखते समय महर्षि पतंजलि ने कात्यायनी के माहात्म्य का वर्णन किया है |

एक समय स्वामी विवेकानंद जी ध्यान में बैठे हुए थे | उनका मन तीव्र ध्यान की अवस्था में नाद-ध्यान में लीन था तभी उन्हें लगा की उनके गर्दन के निचे का शरीर निष्प्राण हो गया है और उनकी चेतना बड़ी तीव्रता से उर्ध्वगामी हो सहस्रार की और अग्रसर है | लेकिन उनके मस्तिष्क में असहनीय पीड़ा भी हो रही है | वो उस चेतना के वेग को रोकने में स्वयम को असमर्थ महसूस कर रहे हैं | लेकिन धीरे धीरे पीड़ा शांत होती गई और आनंद में परिवर्तित होने लगी | बस यही कात्यायनी का तात्विक रूप है | कात्यायनी एक आवेश है अनियंत्रित शक्ति है लेकिन संहार सिर्फ बुराई का ही करती है | कात्यायनी चेतना का वह प्रवाह है जो योगी को सम्पूर्ण बंधन से मुक्त कर उसे पारलौकिक जगत में प्रवेश दे देती है |

माँ कात्यायनी का नाम कात्यायन ऋषि के नाम पर है | इस सन्दर्भ में दो तथ्य हैं |एक यह कि देवी ने ऋषि कात्यायन के पुत्री के रूप में जन्म लिया और दूसरी बात यह की जब त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश ने जब अपनी शक्तियों को मिला कर देवी को प्रगट किया तब वह कात्यायनी के रूप में ही प्रगट हुई और सबसे पहले ऋषि कात्यायन ने ही देवी का स्तवन पूजन किया |

ऋषि कत के पुत्र थे कात्य कात्य के वंश में जन्म लेनेवाले ऋषि कात्ययंन कहलाये | "कत" का अर्थ है "निर्मल" और कात्य अर्थात निर्मल करने वाला | और कात्यायनी सब को निर्मल करने वाली चैतन्य शक्ति माँ है |



सप्तम माँ कालरात्रि



माँ कालरात्री -
काल और रात्री को मिला कर बना है कालरात्री | काल अर्थात परिवर्तन का नियम, परिवर्तन ही काल के अस्तित्व का कारण है | और रात्री अर्थात ठहराव, रात्री के समय परिवर्तन धीमी गति से होता है | भावार्थ को समझे तो रात्री में हर कार्य रुक जाता है | अर्थात काल रात्री अर्थात परिवर्तन से अपरिवर्तन की और ले जाने वाली शक्ति | नश्वरता से इश्वर्ता की और ले जाने वाली शक्ति | जड़ से चेतन की और ले जाने वाली शक्ति |
मृत्यु से अमरत्व की और ले जाने वाली महाशक्ति ही देवी कालरात्रि है | 

यह प्रकृति नित्य परिवर्तनशील है | लेकिन ईश्वर शाश्वत एवं सनातन है | काल प्रकृति का गुण है ईश्वर कालरहित है | जब योगी-साधक की चेतना इन्द्रियों के बंधन को तोड़ने लगती है तब वह इन्द्रियातीत अनुभूतियों को भी प्राप्त करता है | चेतना उर्ध्वगामी हो एकाग्र होने लगती है | तब सांसारिक परिवर्तन योगी को व्यथित नहीं करते | विचारों का खेल और मन की खिट-पिट ही ख़त्म सी हो जाती है | योगी मस्तिष्क की और प्रावाहित होने वाले चेतना के प्रवाह में परमानंद की अनुभूति करता है | इस आनंद के सामने संसार के सारे सुख फीके पड़ जाते हैं - यह अनुभूति का विषय है | 

चैतन्य स्वरूपा माँ कालरात्रि अहंकार रूपी महिषासुर एवं अनियंत्रित विचार रूपी रक्तबीज के लिए महाप्रलय के सामान है | रक्तबीज का रक्त जहां गिरता था वहीँ दुसरा रक्तबीज प्रगट हो जाता था | यही स्थिति हमारे मन में चलने वाले अनियंत्रित विचारों के भी होते हैं | एक विचार से अनेक विचार प्रगट होते हैं | और हम सोंचते सोंचते पता नहीं क्या से क्या सोंच जाते हैं | फिर यही विचार हमारा जीवन बन जाता है | अतः मन के इस रक्तबीज को ख़त्म किये बिना जीवन में शान्ति की अनुभूति नहीं हो सकती | योगी विचारों के प्रवाह पर नियंत्रण स्थापित करके तुरिया अवस्था को प्राप्त कर लेता है | योगी को सम्पूर्ण संसार के प्रति एक साक्षी भाव आ जाता है |

माँ कालरात्रि रक्तबीज का संहार करती है और उसका रक्त भूमि पर गिरे उससे पहले ही उसका पान कर जाती है | वैसे ही विकसित चेतना जब उर्ध्वगामी होती है तो सम्पूर्ण विचारों के प्रवाह को अतिक्रमण एवं दमन करते हुए एकाग्र होने लगती है | ऐसी अवस्था में योगी को ध्यान लगाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता यह स्वतः होने वाली क्रिया है | मन और अहंकार की दुनिया में प्रलय मच जाता है |


अष्टम माँ महागौरी


महागौरी-

महागौरी देवी का वास्तविक निज स्वरुप | योगी-साधक मन एवं विचारों के जटिल-जाल से बाहर निकल कर ही अपने निज स्वरुप का साक्षात्कार कर सकता है | जब मन विकारों से मुक्त हो जाता है तो स्वच्छ और निर्मल हो जाता है | चेतना गौरवर्णा है अर्थात निर्मल है | हम आदि शिव को भी "कर्पूर्गौर्म करुणावतारम" कहते हैं | 

पौराणिक कथा अनुसार एक समय भगवान् शिव ने पार्वती जी को काली कहकर संबोधित किया तब देवी को बहुत बुरा लगा और देवी ने निर्णय लिया कि मैं अपने काले वर्ण का त्याग कर दूंगी | और देवी पार्वती तपस्या करने चली गई | जहां से देवी का राक्छसो के वध करने का अभियान भी शुरू हो गया | सत्य तो यह है कि यह कहानी हर व्यक्ति की है हर योगी साधक की है | संसार के गुण-दोष से आहत होकर व्यक्ति मुक्ति का मार्ग ढूंढता है, और  योग मार्ग से अपने निज-स्वरुप जो कि गौरवर्ण-प्रकाश स्वरुप ज्योति स्वरुप है उसका साक्षात्कार करता है | 

मन एवं अहंकार पर विजय करते हुए ध्यान के तुरिया अवस्था में जो आत्म-साक्षात्कार होता है वही वास्तविक आत्म-साक्षात्कार  है | मन निर्मल हो जाता है | योगी मृत्युजयी हो जाता है | इन्द्रियातीत जगत को अनुभव करता है | फिर वह संसार में रहते हुए भी आसक्त नहीं होता | सांसारिक गुण दोष उसे प्रभावित नहीं करते  | मन जो पहले गुण दोष एवं अनेकानेक भावो के वशीभूत रूपांतरित होता रहता था अब उसका रूपांतरण रुक जाता है | मन अब निश्चल एवं निर्मल रहता है ; संसार के गुण दोष के वशीभूत कोई रूप धारण नहीं करता | योगी अनासक्त भाव से इस संसार में विहार करता है |  अतः चेतना की यह विशुद्ध अवस्था ही महागौरी का निश्चल निर्मल गौरवर्णा स्वरुप है |




नवम माँ सिद्धिदात्री


सिद्धि का तात्पर्य है, जीव के अस्तित्व की सम्पूर्णता की प्राप्ति | माँ सिद्धि दात्री सिद्धियां प्रदान करती है | कमल के पुष्प पर देवी का विराजमान होना आध्यात्मिक ज्ञान-भक्ति की पूर्णता का प्रतीक है | अतः देवी इस रूप में सिर्फ सृजन हीं करती हैं | लेकिन वह सृजन आध्यात्मिक होता है | देवी सिद्धिदात्री शांत एवं सौम्य रूप को धारण किये हुए रहती हैं |

 चेतना की उच्च अवस्था में योगी साधक अपने अस्तित्व के सम्पूर्णता का अनुभव करता है | चेतना  अपने विकास के शिखर को स्पर्श करती है | चेतना विकसित होकर सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर के बंधन को कमजोर कर देती है जिससे सूक्ष्म शरीर का विस्तार हो जाता है | चेतना इन्द्रियों के बंधन को तोड़ कर कार्य करने लग जाती है | योगी का मन स्थूल देह की ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) के परे भी अनुभूति करने लग जाती है | मात्र अनुभूतियाँ हीं नहीं जीव स्थूल हाड़-मांस के देह के परे होकर कर्म भी करने लग जाता है |

पतंजलि योग सूत्र में महर्षि पतंजलि कहते हैं - धारणा से लेकर समाधि तक तीनो को "संयम" भी कहा जाता है | यह संयम ही सिद्धियों का कारण है | योगी किसी भी तत्व के साथ संयम स्थापित कर उस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है | योगी का नियंत्रण पंचभूत - पृथ्वी , जल, वायु, अग्नि पर चलने लगता है | योगी मृत्युजयी हो जाता है | योगी अंतर्धान होने की शक्ति , अनेक रूप धारण करने की शक्ति, सूक्ष्म एवं विशाल होने की शक्ति, परकाया प्रवेश की शक्ति प्राप्त कर लेता | क्षणभर में संसार के किसी भी स्थान पर पहुँच जाने की शक्ति | अनेको शरीरी हो जाने की शक्ति | "योगी कथामृत" पुस्तक में श्री श्री परमहंस योगानंद जी द्विशारीरी संत का वर्णन करते हैं | सिद्ध योगी मृत शरीर में चेतना को प्रवाहित भी कर देने की शक्ति रखते हैं |  

जीव अपने अस्तित्व की पूर्णता को प्राप्त करता है लेकिन यह अवस्था मोक्ष या कैवल्य नहीं है | क्योंकि कैवल्य (समाधि) की अवस्था में जीव अपना अस्तित्व खो देता है | जीव ब्रह्म लीन हो जाता है फिर जीव का अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता है | फिर सिद्धियों का खेल भी नहीं रहता | अतः इसी कारण से महर्षि पतंजलि ने संयम-सिद्धि  के प्रयोग को अष्टांग योग का भाग नहीं माना क्योंकि योग का लक्ष्य समाधि है | और समाधि के लिए सिद्धियों का मोह त्यागना पडेगा है | समाधि तो विजय दशमी का उत्सव है |

नवदुर्गा-तत्व चर्चा

- मनीष देव

Monday, 11 September 2017

साधु और डेरा



साधु और डेरा
( यह दुनिया रैन बसेरा, यहाँ नहीं किसी का डेरा )






'साधु और डेरा' आज कल हमारे देश में इस विषय पर खूब चर्चा चल रही है | वैसे इन दोनों शब्दों के भावार्थ का दूर दूर तक समबन्ध नहीं बनता है; दोनों शब्द एक दुसरे के विरोधी हैं | “यह संसार नित्य परिवर्तन शील एवं चलायमान है”- ग्यानी ऋषियों के द्वारा ‘द्वैतवाद’ के सिद्धांत में भी प्रकृति को नित्य परिवर्तनशील ही परिभाषित किया गया है | ‘त्रैतवाद’ के सिद्धांत में जहां ईश्वर, प्रकृति और जीव के अस्तित्व को स्वीकारा जाता है, वहां भी प्रकृति को नित्य परिवर्तनशील ही बताया गया है | फिर वो साधू, संत और सन्यासी जो निरंतर इस संसार की परिवर्तनशीलता का उपदेश समाज को देते रहते हैं, वो कैसे इस नित्य परिवर्तनशील संसार में डेरा बना कर बैठ जायेंगे | अतः इसीलिए साधू और डेरा का सम्बन्ध विरोधात्मक है | लेकिन आज के वर्तमान समय में साधू को डेरा और संस्थान से जोड़ कर हीं देखा जा रहा है | आइये थोडा सनातन धर्म ग्रंथों में देखते हैं कि साधू और सन्यासी को कैसे परिभाषित किया जा रहा है | 
लिंगपुराण(10/11) के पूर्व भाग में कहा गया है –
 यतमानो यतिः साधु: स्मृतो योगस्य साधनात्।
एवमाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृतः ।।
-जो योग के साधनो में साधनारत हो कर धर्म में यत्नमान होता है वही यति है। आश्रम और धर्म के साधनो को जो साधते हुए व्रत-परायण रहता है, वह साधु कहा गया है।

ग्रहस्थो ब्रम्हचारी च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
धर्माधर्माविह प्रोक्तौ शब्दावेतौ क्रियात्मको ।।
-गृहस्थ, ब्रम्हचारी,वानप्रस्थ और सन्यास(परिव्राज) ये चारों साधु कहे गए हैं। जो नियमित रूप से चारो आश्रमों का पालन अनासक्त भाव से करे वो साधु ही कहलाता है | अर्थात जो नित्य यत्न पूर्वक निर्वाण की साधना में लगा हुआ है, वो साधु है | इस संसार को नित्य परिवर्तनशील समझते हुए, अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवन के अंत में सम्पूर्ण आशाओं का त्याग कर दे वो सन्यासी हो जाता है | वैदिक युग में ‘संन्यास’ जीवन का आखिरी समय है | वस्तुतः संन्यास वह मनोभाव है, जिसमे सन्यासी को इस परिवर्तनशील संसार से किसी प्रकार की कोई आशा नहीं रह जाती | ना कर्म कि और न ही कर्म-फल की | ना यश-अपयश की ना ही लाभ हानि की ना ही निर्माण की और ना ही विनाश की | ना ही दुनिया बदलने की कोई महत्वाकांक्षा | कोई उसे सुनेगा या नहीं सुनेगा कोई उसे मानेगा या नहीं मानेगा ;  सन्यासी इन भावों से मुक्त हो जाता है |

वेश भूषा और सांसारिक त्याग के नियम के अनुसार शास्त्रों में चार प्रकार के सन्यासी बताये गए हैं – कुटीचक्र, बहुदक, हंस एवं परमहंस | परन्तु आध्यात्मिक अवस्था के आधार पर सन्यासी के दो ही भेद बताये गए हैं – ‘तुरीयातीत’ एवं ‘अवधूत’ अवस्था जहां योगी को सम्पूर्ण संसार से अनासक्ति हो जाती है  |

मैत्रेय उपनिषद में बताया गया -
 वमनाहारवद्यस्य भाति सर्वेषणादिषु ।
तस्याधिकारः सन्यासे त्यक्तदेहाभिमानिनः।।18

एषणा अर्थात इच्छाप्राप्ति। एषणा वो है जो भी संसार में दिखाई देता हो, उनके प्राप्ति की इच्छा अथवा विश्व में विस्तार एवं प्रसार की इक्षा । समस्त प्रकार के धन प्राप्ति की इक्षा।  उपरोक्त सभी प्रकार की कामनाएं एवं इक्षाओं को वमन(उलटी) किये हुए आहार की भाँति जब लगने लगे । जिसने शरीर और नाम के सम्बन्ध से सभी प्रकार की ममता को नष्ट कर दिया है, उसे ही सन्यास का अधिकार है। श्रीमदभागवतमहापुराण के अवधूत-गीता प्रसंग में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि संत कभी संघ नहीं बनाते | सन्यासी का संगठन तो उसके इन्द्रियों का संगठन होता है |


परन्तु आज के परिवेश में साधु संतों की बड़ी बड़ी संस्थाएं और डेरे नजर आते हैं | संस्थान के प्रचार प्रसार और अपना झंडा गाड़ने की महत्वकांक्षा नजर आती है | और गुरु-भक्ति और गुरु-घर की सेवा के नाम पर खूब धन धान्य एकत्र किया जाता है | ज्यादा धन लाने वाले सेवकों को श्रेष्ट सेवक-भक्त घोषित किया जाता है, और सेवक भी मान सम्मान के मोह में उचित अनुचित का भेद भूल जाता है | मोक्ष, स्वर्ग और विश्व-शान्ति का स्वप्न सेवको को दिखा कर उन्हें संस्थानवाद का कूप-मंडूक बना दिया जाता है | भक्तो को लगने लग जाता है कि अब बहुत जल्द विश्व-शान्ति आ जायेगी और हमारा मोक्ष तो निश्चित हो गया है; सब कुछ शांत हो जाएगा और सनातन धर्म के द्वैतवाद का सिद्धांत झूठा हो जाएगा ! सत्य तो यह है कि जिसका मन शांत नहीं हुआ, उसके लिए विश्व-शान्ति कभी नहीं आने वाली | सेवक वर्ग गुरु भक्ति के नाम पर उतना ही पढता है, और उतना ही सुनता है, जितना गुरुपद के नाम पर संस्थान का मुखिया उन्हें बताता है | और एक बहुत बड़ा समूह गुरु-भक्ति के नाम पर घोड़े का चश्मा पहन लेता है | सत्य तो यह है कि संस्थान एक माध्यम हो सकता है, लक्ष्य नहीं ! लेकिन ये संस्थानवादी भक्त, राष्ट्र एवं शास्त्रों के संविधान से ऊपर अपने संस्थान के संविधान को मानने लग जाते हैं |

अतः आज अति आवश्यक है कि साधु, सन्यासी एवं धर्म की शास्त्र-सम्मत परिभाषाओं को फिर से समझा जाए |

-मनीष देव  

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna-

संत बनने की वासना / sant banane ki vasna- https://youtu.be/lGb7E-LBo14